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19-Jan-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। साल 2026 की शुरुआत दुनिया के लिए किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं रही। जनवरी के पहले ही हफ्ते में वेनेजुएला में अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज के एक गुप्त ऑपरेशन ने वैश्विक राजनीति को हिला दिया। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा किए जाने की खबरों के बाद यह सवाल उठने लगा कि डोनाल्ड ट्रंप अब अगला कदम कहां रखेंगे। ईरान, उत्तर कोरिया या फिर कोई और देश? लेकिन कुछ ही दिनों में ट्रंप ने जिस दिशा में संकेत दिया, उसने यूरोप से लेकर रूस और चीन तक की नींद उड़ा दी। ग्रीनलैंड, जो तकनीकी रूप से नाटो सदस्य डेनमार्क का हिस्सा है, अचानक अमेरिकी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया। ट्रंप ने खुले तौर पर कहा कि ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में आना चाहिए। उनके इस बयान को महज एक सनकी सोच मानकर खारिज करना आसान था, लेकिन जैसे-जैसे इसके पीछे की रणनीति सामने आई, यह साफ हो गया कि मामला कहीं ज्यादा गंभीर है। ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’ और नई अमेरिकी सोच राजनीतिक विश्लेषकों ने ट्रंप की इस नीति को नया नाम दिया है ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’। यह 1823 की मुनरो डॉक्ट्रिन की आधुनिक छाया मानी जा रही है, जिसमें अमेरिका ने पूरे अमेरिकी महाद्वीप को अपना प्रभाव क्षेत्र घोषित किया था। फर्क बस इतना है कि अब ट्रंप की नजरें अमेरिका के पार, आर्कटिक तक जा पहुंची हैं। उनके लिए अमेरिका उनका “बैकयार्ड” है और ग्रीनलैंड “फ्रंटयार्ड”। ट्रंप का तर्क है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर पकड़ मजबूत नहीं की, तो रूस या चीन वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा देंगे। ट्रुथ सोशल पर उन्होंने साफ लिखा है “ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।” ग्रीनलैंड क्यों है इतना अहम? दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड आकार में भारत के लगभग दो-तिहाई के बराबर है। यहां विशाल मात्रा में खनिज, रेयर अर्थ मेटल्स और प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। ये वही तत्व हैं, जिन पर भविष्य की टेक्नोलॉजी जैसे इलेक्ट्रिक वाहन, मिसाइल सिस्टम और सैटेलाइट निर्भर करती है। इसके अलावा ग्रीनलैंड नॉर्थवेस्ट पैसेज के पास स्थित है। जलवायु परिवर्तन के चलते जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, यह समुद्री मार्ग आने वाले वर्षों में एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा रास्ता बन सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो हिंद महासागर के पारंपरिक व्यापारिक मार्गों की अहमियत कम हो सकती है। अमेरिका पहले से ही इस मार्ग के एक छोर अलास्का में मौजूद है। ग्रीनलैंड दूसरे छोर की चाबी बन सकता है। ‘गोल्डन डोम’ शीत युद्ध के दौर से ही अमेरिका ग्रीनलैंड को सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता रहा है। यहां मौजूद पिटुफिक स्पेस बेस से रूस की ओर से आर्कटिक के रास्ते आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों पर नजर रखी जाती है। ट्रंप इसे अपने महत्वाकांक्षी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा मानते हैं। दिलचस्प बात यह है कि डेनमार्क का दावा है कि अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपने कई पुराने सैन्य अड्डे खुद ही बंद कर दिए थे। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर रणनीतिक फायदे समझौते से मिल सकते हैं, तो सीधे कब्जे या खरीद की जिद क्यों? मैनिफेस्ट डेस्टिनी की वापसी इस सवाल का जवाब इतिहास में छिपा है। 19वीं सदी में अमेरिका में एक विचारधारा उभरी थी मैनिफेस्ट डेस्टिनी। इसके मुताबिक अमेरिका का विस्तार होना न सिर्फ तय, बल्कि नैतिक रूप से सही माना गया। राष्ट्रपति जेम्स के. पोल्क के कार्यकाल में इसी सोच के तहत अमेरिका ने ब्रिटेन से ओरेगन, मेक्सिको से टेक्सास और कैलिफोर्निया हासिल कर देश को समुद्र से समुद्र तक फैला दिया। अमेरिका का इतिहास देखें तो वह किसी रियल एस्टेट साम्राज्य से कम नहीं रहा। 1803 में फ्रांस से लुइसियाना 15 मिलियन डॉलर में खरीदा गया, 1867 में रूस से अलास्का 7.2 मिलियन डॉलर में। अपने कुल क्षेत्रफल का करीब 40 फीसदी हिस्सा अमेरिका ने खरीद के जरिए हासिल किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने गुप्त रूप से डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन उसे ठुकरा दिया गया। अब करीब आठ दशक बाद वही विचार नए रूप में लौटता दिख रहा है। 250वां बर्थडे और ऐतिहासिक विरासत ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड सिर्फ रणनीति नहीं, विरासत का सवाल भी है। 4 जुलाई 2026 को अमेरिका अपनी आजादी के 250 साल पूरे करेगा। इस मौके पर भव्य समारोहों की योजना है। व्हाइट हाउस में नया स्टेट बॉलरूम बन रहा है और ट्रंप इन आयोजनों के केंद्र में रहना चाहते हैं। अगर इसी दिन ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका का 51वां राज्य घोषित कर देते हैं। यह कदम उन्हें 21वीं सदी का जेम्स पोल्क बना सकता है। एक न्यूयॉर्क के अरबपति रियल एस्टेट कारोबारी के लिए यह सौदा सिर्फ जमीन का नहीं, इतिहास में नाम दर्ज कराने का होगा। दुनिया के लिए चेतावनी यूरोप पहले ही ट्रंप की बयानबाजी से सहमा हुआ है। यहां तक कि कुछ यूरोपीय नेताओं को अब रूस के राष्ट्रपति पुतिन पहले से कम खतरनाक लगने लगे हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज का रूस से रिश्तों को “फिर से संतुलित” करने का बयान इसी बदलते माहौल का संकेत है। स्पष्ट है कि ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की जिद किसी एक द्वीप तक सीमित नहीं। यह उस सोच की वापसी है, जिसमें ताकतवर देश सीमाओं को इतिहास, सुरक्षा और विरासत के नाम पर दोबारा खींचना चाहते हैं। सवाल सिर्फ इतना है क्या दुनिया 21वीं सदी में इस विस्तारवाद को स्वीकार करने के लिए तैयार है?