राष्ट्रीय
19-Jan-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच बढ़ते तनाव के बीच यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जाएद (एमबीजेड) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के न्यौते पर नई दिल्ली पहुंचे हैं। कटूनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एमबीजेड भारत आए हैं ताकि सऊदी अरब के बढ़ते दबाव और खाड़ी में असंतुलन के बीच भारत के साथ अपने सहयोग को मजबूत कर सके। मध्य पूर्व विशेषज्ञ के अनुसार, सऊदी और यूएई के बीच चल रहा झगड़ा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि “व्यवस्था और अव्यवस्था के बीच संघर्ष को दिखाता है। ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब जीसीसी देशों में अग्रणी और स्वतंत्र था, जबकि यूएई ब्रिटिश संरक्षण में था। यूएई के तेजी से आर्थिक और राजनीतिक विकास ने सऊदी नेतृत्व को कई बार हैरान किया। 2008 में यूएई ने ईरान के साथ सहयोग समझौता किया, जबकि सऊदी ने ईरान को धमकी दी थी। यमन युद्ध में भी यूएई ने सऊदी गठबंधन के विरोधियों का समर्थन किया और दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद (एसटीआई) का गठन करके यमन में अपनी रणनीति लागू की। इस कदम ने सऊदी के दस सालों के प्रयास को करीब समाप्त कर दिया और यूएई को मुस्लिम दुनिया में अलग-थलग कर दिया। वहीं साल 2020 में यूएई द्वारा अब्राहम अकॉर्ड के तहत इजरायल को मान्यता देने से सऊदी और भी नाराज हुआ। 2018 में यमन में अल-कायदा के कुछ आतंकियों को यूएई के समर्थन की खबरें आईं। इसके अलावा, बहरीन में जीसीसी शिखर सम्मेलन के दौरान यूएई ने एसआईटी को और ज्यादा इलाका हथियाने का आदेश दिया, जिससे नागरिक हताहत हुए। सऊदी ने यूएई के एसआईटी को नए कब्जे वाले इलाकों से पीछे हटने का 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया। जब यूएई ने इसका पालन नहीं किया, तब सऊदी ने मुकल्ला बंदरगाह पर यूएई के टैंकों और हथियारों पर हमला किया। इसके परिणामस्वरूप सिर्फ पांच दिनों में यमन में यूएई के एसआईटी मिलिशिया को समाप्त कर दिया गया। इस तरह अबू धाबी का यमन में लगभग दस सालों का प्रोजेक्ट खत्म हो गया। मौजूदा समय में एमबीजेड और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) का व्यक्तिगत रिश्ता भी तनावपूर्ण हुआ है। पहले एमबीजेड ने छोटे एमबीएस को मेंटर और गुरु माना था, लेकिन अब दोनों नेता खाड़ी में आर्थिक और भू-राजनीतिक दबदबे के लिए प्रतिद्वंद्वी बन गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यूएई का भारत दौरा सिर्फ राजनीतिक दोस्ती नहीं, बल्कि सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को भी मजबूती देने का कदम है। भारत और यूएई के बीच मजबूत व्यापार और कूटनीतिक संबंध हैं, जबकि सऊदी-यूएई तनाव के बीच भारत किसी एक पक्ष को चुनने से बच सकता है। पूर्व डिप्लोमेट मानते हैं कि यह संघर्ष केवल खाड़ी की सत्ता का नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था और अव्यवस्था के बीच टकराव है। यमन, सूडान और सोमालिया में अबू धाबी-इजरायल की योजनाओं के खुलासे ने यूएई को अलग-थलग कर दिया, और पाकिस्तान ने सऊदी-तुर्की गुट का समर्थन किया। इस कारण यूएई अब भारत के भरोसे के साथ रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहता है। एमबीजेड की भारत यात्रा को मध्य पूर्व में यूएई के लिए नया सहारा तलाशने, सऊदी के दबाव को संतुलित करने और भारतीय सहयोग से अपने भू-राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है। आशीष दुबे / 19 जनवरी 2026