लेख
22-Jan-2026
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(24 जनवरी – राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष लेख) सुबह का समय है। घर के एक कोने में बहुत हल्की-सी रोने की आवाज़ गूंजती है। एक बच्ची ने जन्म लिया है। कोई जल्दी से दरवाज़ा बंद कर देता है, कोई बाहर निकलकर गहरी साँस लेता है। किसी चेहरे पर मुस्कान है, किसी की आँखों में चिंता, और कहीं-कहीं एक अनकहा सवाल— लड़की? यहीं से शुरू होती है भारत की बेटी की कहानी। बिना किसी मंच, बिना किसी घोषणा के—एक ऐसा सफ़र, जो लंबा है, कठिन है और अक्सर चुपचाप तय किया जाता है। हर साल 24 जनवरी को देश राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाता है। यह दिन केवल शुभकामनाओं, भाषणों और पोस्टरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह तारीख हमें रुककर सोचने का मौका देती है—खुद से सवाल करने का। क्या हमने सच में बेटियों के लिए दुनिया थोड़ी आसान बनाई है? क्या उन्हें वह सुरक्षा, सम्मान और आज़ादी मिली है, जिसकी बातें हम गर्व से करते हैं? यह तारीख हमें इतिहास के एक निर्णायक क्षण की याद दिलाती है— 24 जनवरी 1966 , जब इंदिरा गांधी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उस दौर में दुनिया के बहुत कम देशों में किसी महिला को इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। भारत ने तब यह संदेश दिया था कि वह महिलाओं पर भरोसा कर सकता है। लेकिन लगभग छह दशक बाद आज सवाल और भी ज़्यादा ज़रूरी है— क्या वह भरोसा भारत की आम बेटी तक पहुँच पाया? भारत में हर साल लगभग 2.5 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं, जिनमें लगभग आधी संख्या लड़कियों की होती है। लेकिन आँकड़ों के पीछे की सच्चाई परेशान करने वाली है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का जन्म के समय लिंगानुपात 2014–15 में लगभग 918 लड़कियाँ प्रति 1000 लड़के था, जो 2023–24 तक बढ़कर लगभग 930 तक पहुँचा है। यह सुधार ज़रूर है, लेकिन बेहद धीमा। कुछ राज्यों—जैसे केरल —में लिंगानुपात अपेक्षाकृत संतुलित है, जबकि हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आज भी यह चिंता का विषय बना हुआ है। कई जगहों पर हाल के वर्षों में लिंगानुपात में फिर गिरावट दर्ज की गई है। यह बताता है कि समस्या क़ानूनों से नहीं, सोच से जुड़ी हुई है । कई बेटियाँ जन्म से पहले ही इस दुनिया को देखने का मौका नहीं पातीं। और जो जन्म लेती हैं, उनके हिस्से अक्सर कम पोषण, कम इलाज और कम ध्यान आता है। यूनिसेफ और राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण से प्रभावित बच्चों में लड़कियों की हिस्सेदारी अधिक है, और कई मामलों में इलाज देर से मिलने के कारण उनकी जान तक चली जाती है। जैसे-जैसे लड़की बड़ी होती है, उसकी दुनिया और सिमटती जाती है। यूनिसेफ के अनुसार , भारत में आज भी हर साल लाखों लड़कियाँ बाल विवाह का शिकार होती हैं। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद, यह प्रथा बेटियों से उनका बचपन, शिक्षा और स्वास्थ्य छीन लेती है। स्कूल की किताबें अलमारी में रख दी जाती हैं और हाथों में ऐसी ज़िम्मेदारियाँ थमा दी जाती हैं, जिनके लिए वे न मानसिक रूप से तैयार होती हैं, न शारीरिक रूप से। हिंसा केवल अख़बारों की सुर्खियों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि हर दिन सैकड़ों लड़कियाँ और महिलाएँ हिंसा का शिकार होती हैं। यह हिंसा घर के भीतर भी होती है, स्कूल के रास्ते में भी और काम की जगह पर भी। और जब कोई लड़की बोलने की हिम्मत करती है, तो अक्सर सवाल उसी से पूछे जाते हैं—क्यों गई थी, क्यों चुप नहीं रही, क्यों देर हो गई? निर्भया, उन्नाव, कठुआ जैसे मामलों ने देश को झकझोरा। कानून बदले, सख्त धाराएँ जोड़ी गईं, लेकिन सच्चाई यह है कि हर चर्चित मामले के पीछे सैकड़ों अनसुनी कहानियाँ हैं। न्याय में देरी पीड़िताओं के घाव भरने के बजाय उन्हें और गहरा कर देती है। सरकार ने बेटियों की स्थिति सुधारने के लिए कई योजनाएँ शुरू कीं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना 2015 में शुरू हुई, जिसका उद्देश्य लिंगानुपात सुधारना और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना था। सरकारी दावों के अनुसार, इसके बाद कुछ जिलों में जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार देखा गया। इसी तरह सुकन्या समृद्धि योजना भी 2015 में शुरू की गई। शुरुआती वर्ष में जहाँ केवल लगभग 4 लाख खाते खुले थे, वहीं 2024 तक देशभर में 4 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं। यह दर्शाता है कि धीरे-धीरे परिवारों का भरोसा बढ़ा है। लेकिन योजनाओं से ज़्यादा ज़रूरी है मानसिकता का बदलाव। काग़ज़ों पर बराबरी लिखी जा सकती है, मगर समाज की सोच बदलने में समय, शिक्षा और ईमानदार प्रयास लगते हैं। राजनीति और सत्ता की तस्वीर भी अलग नहीं है। आज़ादी के 75 वर्षों में भारत में केवल लगभग 17 महिलाएँ मुख्यमंत्री बन पाईं। कई बड़े राज्यों में आज तक कोई महिला मुख्यमंत्री नहीं रही। इंदिरा गांधी के बाद मायावती, जयललिता, ममता बनर्जी, शीला दीक्षित, वसुंधरा राजे, राबड़ी देवी और उमा भारती जैसी महिलाओं ने नेतृत्व किया, लेकिन उन्हें अपने काम से ज़्यादा अपने व्यक्तित्व, कपड़ों और आवाज़ पर सवालों का सामना करना पड़ा। हम गर्व से कहते हैं—हमारी बेटियाँ कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स बनेंगी। हम उनकी सफलता पर तालियाँ बजाते हैं। लेकिन क्या हम वह ज़मीन भी सुरक्षित बना रहे हैं, जहाँ से ये उड़ानें शुरू होती हैं? क्योंकि किसी भी देश की असली तरक्की उसकी ऊँची इमारतों या तेज़ सड़कों से नहीं, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि वह अपनी बेटियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिस दिन भारत की हर बेटी बिना डर, बिना समझौते और पूरे सम्मान के अपने सपनों की ओर कदम बढ़ा सकेगी—उसी दिन यह देश सच मायनों में महान कहलाएगा। राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें यही याद दिलाता है कि बेटियों का सम्मान एक दिन का विषय नहीं, हर दिन की ज़िम्मेदारी है। जिस देश ने कभी एक महिला को लोकतंत्र की कमान सौंपी थी, उसे अब हर बेटी को उसकी ज़िंदगी की कमान सौंपनी होगी। क्योंकि जब एक बेटी मज़बूत होती है, तो सिर्फ़ उसका भविष्य नहीं संवरता—पूरे देश की नींव मज़बूत होती है। ईएमएस / 23 जनवरी 26