अंतर्राष्ट्रीय
22-Jan-2026
...


वॉशिंगटन (ईएमएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी अमेरिका फर्स्ट नीति को एक नए और आक्रामक स्तर पर ले जाते हुए वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। ट्रंप ने न केवल ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की अपनी पुरानी मांग को दोहराया है, बल्कि हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दीएगो गार्सिया द्वीप को लेकर ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए समझौते की भी तीखी आलोचना की है। ट्रंप का यह रुख दुनिया भर में भू-राजनीतिक अस्थिरता की आशंकाओं को जन्म दे रहा है, क्योंकि वे खुलेआम कनाडा और वेनेजुएला जैसे देशों को भी अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा बता रहे हैं। इससे भारत के लिए भी संकट खड़ा हो सकता है। दीएगो गार्सिया का मुद्दा भारत के लिए भी बेहद संवेदनशील है। हालांकि ट्रंप ने अपने हालिया बयान में भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन भारत ने ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए इस समझौते का पुरजोर समर्थन किया है। दीएगो गार्सिया चागोस द्वीप समूह का सबसे बड़ा हिस्सा है, जहां 1960 के दशक से अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा संचालित है। यह अड्डा मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका में अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए एक मुख्य केंद्र की भूमिका निभाता है। 1965 में ब्रिटेन ने इसे मॉरीशस से अलग कर दिया था, जिसके बाद वहां के मूल निवासियों को जबरन विस्थापित किया गया था। लंबे विवाद के बाद मई 2025 में हुए समझौते के तहत चागोस की संप्रभुता मॉरीशस को देने और दीएगो गार्सिया को 99 साल की लीज पर ब्रिटेन के पास रखने की बात कही गई थी। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर ब्रिटेन की उस योजना पर कड़ा प्रहार किया, जिसके तहत वह चागोस द्वीप समूह (जिसमें दीएगो गार्सिया शामिल है) की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने जा रहा है। ट्रंप ने इस कदम को पूर्ण कमजोरी और बड़ी मूर्खता करार देते हुए कहा कि हमारा नाटो सहयोगी बिना किसी ठोस कारण के एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य अड्डे वाली जमीन को छोड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि चीन और रूस जैसी वैश्विक शक्तियां पश्चिम की इस कमजोरी पर नजर रखे हुए हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा की इन्हीं चुनौतियों के कारण ग्रीनलैंड को हासिल करना अमेरिका के लिए बेहद जरूरी हो गया है। उन्होंने डेनमार्क और उसके सहयोगियों को सही काम करने की नसीहत देते हुए ग्रीनलैंड पर कब्जे के संकेत दिए। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप प्रशासन ने पूर्व में इस समझौते को एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया था, लेकिन अब ट्रंप ने इस पर यू-टर्न ले लिया है। ब्रिटेन सरकार ने ट्रंप की आलोचना का बचाव करते हुए कहा है कि यह समझौता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक था क्योंकि अदालती विवादों के कारण सैन्य अड्डे के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा था। ब्रिटेन ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका को इस अड्डे तक पूर्ण पहुंच बनी रहेगी। इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली लंबे समय से मॉरीशस के उपनिवेशवाद विरोधी प्रयासों का समर्थन करती रही है और उसने मॉरीशस को करोड़ों डॉलर का विकास पैकेज भी दिया है। भारत हिंद महासागर को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और यहां किसी भी तरह के अस्थिर सैन्य विस्तार का विरोध करता रहा है। 1971 के युद्ध के समय अमेरिका के साथ रहे तनावपूर्ण संबंधों के विपरीत आज भारत और अमेरिका के रक्षा संबंध बेहद मजबूत हैं, लेकिन ट्रंप का ताजा बयान इस क्षेत्रीय संतुलन और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर सवालिया निशान खड़े कर सकता है। ग्रीनलैंड से लेकर दीएगो गार्सिया तक ट्रंप की यह विस्तारवादी बयानबाजी आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति की दिशा बदल सकती है। वीरेंद्र/ईएमएस 22 जनवरी 2026