राष्ट्रीय
22-Jan-2026


मुंबई(ईएमएस)। महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता के समीकरण हर दिन एक नया मोड़ ले रहे हैं। राज्य स्तर पर महायुति गठबंधन के साथ सरकार चलाने वाले दल अब नगर निगमों पर कब्जे के लिए अपने ही सहयोगियों को किनारे करने से परहेज नहीं कर रहे हैं। विशेष रूप से बीएमसी मेयर पद को लेकर भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच चल रही खींचतान अब राज्य के अन्य प्रमुख नगर निगमों तक फैल गई है। इसे महायुति में दरार का संकेत माना जा रहा है। ताजा घटनाक्रम में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने उल्हासनगर और कल्याण-डोंबिवली महानगर पालिका में ऐसी चालें चली हैं, जिससे उनकी मुख्य सहयोगी भाजपा सीधे विपक्ष में बैठने की कगार पर पहुँच गई है। उल्हासनगर नगर निगम में सत्ता पर काबिज होने के लिए मुख्यमंत्री शिंदे ने बुधवार को 40 पार्षदों का एक नया गुट बनाया है। इस गुट के गठन के साथ ही भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 78 सदस्यीय उल्हासनगर नगर निगम में बहुमत के लिए 40 पार्षदों की आवश्यकता है। हालिया चुनावों में भाजपा 37 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, लेकिन वह बहुमत के जादुई आंकड़े से तीन कदम दूर रह गई। वहीं, शिंदे की शिवसेना ने 36 सीटें जीती थीं। अब शिंदे ने प्रकाश अंबेडकर की पार्टी वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) के दो पार्षदों और एक स्थानीय गठबंधन के दो पार्षदों को साथ लेकर बहुमत का आंकड़ा हासिल कर लिया है। पार्षद अरुण आशान को इस नए गुट का नेता चुना गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस समीकरण को साधने के लिए कांग्रेस ने भी बाहर से समर्थन देने के संकेत दिए हैं, जिसके बदले में कांग्रेस भिवंडी-निजामपुर नगर निगम में शिंदे का समर्थन चाहती है। सत्ता का यह खेल केवल उल्हासनगर तक सीमित नहीं है। कल्याण-डोंबिवली महानगर पालिका में भी शिंदे की शिवसेना ने भाजपा का साथ छोड़कर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ हाथ मिला लिया है। कुल 122 सीटों वाली इस महानगर पालिका में बहुमत के लिए 62 सीटों की जरूरत है। यहाँ शिंदे गुट 53 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा है, जबकि भाजपा को 50 सीटें मिली हैं। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए शिंदे ने मनसे के 5 पार्षदों और अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर अपना मेयर बनाने की तैयारी पूरी कर ली है। उद्धव ठाकरे गुट (शिवसेना यूबीटी) को यहाँ 11 सीटें मिली हैं, लेकिन उनके रुख को लेकर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है। जानकारों का मानना है कि निकाय चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ यह दांव-पेंच आने वाले विधानसभा चुनावों और राज्य की महायुति सरकार के भविष्य पर भी असर डाल सकते हैं। स्थानीय स्तर पर मेयर की कुर्सी पाने की यह होड़ दर्शाती है कि गठबंधन के भीतर विश्वास की भारी कमी है। यदि उल्हासनगर और कल्याण में शिंदे अपनी योजना में सफल होते हैं, तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका होगा, क्योंकि वह सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता से बाहर हो जाएगी। फिलहाल, सबकी नजरें विभागीय आयुक्त और नगर निगम प्रशासन की ओर से ग्रुप रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पर टिकी हैं। वीरेंद्र/ईएमएस/22जनवरी2026