लेख
23-Jan-2026
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मलेशिया के पेराक राज्य में स्थित ताइपिंग के कॉमनवेल्थ युद्ध स्मारक की यात्रा के दौरान हमारे विचार उन भारतीय सैनिकों की ओर गए, जो द्वितीय विश्व युद्ध के मलाया अभियान के समय जापानियों द्वारा मारे गए, घायल हुए या युद्धबंदी (POWs) बनाए गए थे। इन भारतीय युद्धबंदियों में से अनेक बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में गठित आईएनए -आज़ाद हिंद फ़ौज का हिस्सा बने। ताइपिंग वॉर कब्रिस्तान द्वितीय विश्व युद्ध के मलाया अभियान के दौरान शहीद हुए मित्र राष्ट्रों के सैन्य कर्मियों का स्मारक और अंतिम विश्राम स्थल है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटिशों ने ब्रिटिश मलाया—जिसमें वर्तमान मलेशिया और सिंगापुर शामिल थे—की रक्षा के समन्वय के लिए ‘मलाया कमांड’ की स्थापना की। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ के साथ ही मलाया कमांड को सुदृढ़ किया गया। मित्र राष्ट्रों की सेनाओं में ब्रिटिश भारतीय सेना का महत्वपूर्ण योगदान था। भारतीय सैनिक पैदल सेना, तोपखाना, इंजीनियरिंग और सहायक इकाइयों में सेवाएं दे रहे थे। इन सैनिकों में एक उल्लेखनीय संख्या वर्तमान उत्तराखंड से थी। इनमें रॉयल गढ़वाल राइफल्स (अब गढ़वाल राइफल्स) की दूसरी और पाँचवीं बटालियन तथा कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन (तत्कालीन 4/19 हैदराबाद रेजिमेंट) शामिल थीं। दिसंबर 1941 में गढ़वाल राइफल्स की दूसरी बटालियन और कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन सहित भारतीय रेजिमेंटों को सक्रिय युद्ध में झोंक दिया गया। अपर्याप्त तैयारी और गंभीर रसद संबंधी कमियों के बावजूद, इन इकाइयों ने साहस और दृढ़ संकल्प के साथ युद्ध किया। अनेक सैनिक मारे गए या घायल हुए, जबकि कई को बंदी बना लिया गया। जनवरी 1942 में गढ़वाल राइफल्स की नवगठित पाँचवीं बटालियन सहित अतिरिक्त इकाइयाँ तैनात की गईं। अन्य भारतीय सेना बटालियनों की तरह इन्हें भी भारी क्षति उठानी पड़ी और जीवित बचे सैनिक युद्धबंदी बना लिए गए। इन्हीं भारतीय युद्धबंदियों में से—और बाद में मलाया में बसे भारतीय प्रवासियों के स्वयंसेवकों के साथ—नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आईएनए यानी आज़ाद हिंद फ़ौज, का गठन हुआ। मलाया अभियान के दौरान शहीद हुए अनेक सैनिकों को सिंगापुर के चांगी स्थित कॉमनवेल्थ युद्ध स्मारकों में तथा कुछ को मलेशिया के ताइपिंग वॉर कब्रिस्तान में स्मरण किया गया है। ताइपिंग कब्रिस्तान दो भागों में विभाजित है—एक ईसाइयों के लिए, जहाँ ‘क्रॉस ऑफ़ सैक्रिफ़ाइस’ स्थापित है, और दूसरा गैर-ईसाइयों के लिए, जिसे ‘स्टोन ऑफ़ रिमेम्ब्रेंस’ द्वारा चिह्नित किया गया है। 500 से अधिक अज्ञात सैनिकों को रेजिमेंटल प्रतीकों वाले सफ़ेद ग्रेनाइट शिलालेखों से स्मरण किया गया है। हमारी यात्रा के दौरान गढ़वाल राइफल्स के प्रतीक वाले चार सफ़ेद ग्रेनाइट शिलालेख एक पंक्ति में दिखाई दिए, जिन पर सरल शब्दों में अंकित था: “भारतीय सेना का एक सैनिक, 1939–1945, रॉयल गढ़वाल राइफल्स, जून 1943।” कब्रिस्तान की शांति, सुकून और स्वच्छता ने युद्ध और बलिदान की करुणा को और गहरा कर दिया। ये स्मारक शिलाएँ उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास पर चिंतन को प्रेरित करती हैं—जहाँ के पुरुषों ने दोनों विश्व युद्धों में लड़ने के लिए दुनिया के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की, उस समय जब घर पर अधिकांश लोग—विशेषकर महिलाएँ—अपने गाँवों से बाहर भी शायद ही गई थीं। आज दुनिया देखने की आकांक्षा सार्वभौमिक हो चुकी है। (लेखक डी. के. बुडाकोटी एक समाजशास्त्री हैं और डॉ. स्वागता सिन्हा रॉय मलेशिया की एक विश्वविद्यालय—यूटीएआर—में अध्यापन करती हैं) (यह लेखक और ले‎खिका के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 23 जनवरी /2026