अब धीरे-धीरे भारतीय प्रजातंत्र के संवैधानिक स्तंभ चुनाव आयोग को राजनीति के दायरे में लाकर उस पर ‘सत्ता की चमचागिरी’ के गंभीर आरोप लगाए जा रहे है, अब यह एक आम परिपाटी ही बन गई है कि चुनावों में पराजित होने वाला हर राजनीतिक दल व उसके नेता अपनी हार का ‘ठीकरा’ चुनाव आयोग के सिर पर फोड़ने लगे है, जबकि स्वतंत्र भारत में चुनाव आयोग को स्वतंत्र संवैधानिक दर्जा प्राप्त है और उसे राजनीति तो क्या सरकारी सत्ता से ऊपर ही माना जाता रहा है, किंतु पिछले कुछ समय से इस संवैधानिक संगठन को भी राजनीति के दायरे में लाने की जी-तोड़ प्रयास किए जा रहे है कि और यहां यह भी सही है कि इस गंभीर आरोप के पीछे शत-प्रतिशत नही तो कुछ प्रतिशत तो सच्चाई होगी ही, किंतु हमारा संविधान यही कहता है कि चुनाव आयोग को राजनीति से ऊपर ही रहना चाहिए। अब यहां सबसे अहम् सवाल यही उठाया जा रहा है कि क्या भारतीय चुनाव आयोग के गठन के संवैधानिक नियमों मेें कोई भूल हुई है? जिसके कारण चुनाव पदाधिकारी सत्ता व उसके राजनेताओं को विशेष महत्व देते है? या कोई और विशेष कारण है? क्या इसमें विराजमान पदाधिकारियों को यह भय रहता है कि वे सत्ता की राजनीति के साथ नही रहे तो उन्हें हटाया जा सकता है? इसलिए अब इन प्रश्नों पर गंभीर चिंतन करना जरूरी है, यद्यपि चुनाव आयोग का कानून उसकी प्रतिबद्धता सीधे राष्ट्रपति जी के साथ जोड़ता है, किंतु फिर भी चुनाव आयोग सत्तारूढ़ राजनीति के साथ जुड़ा हुआ ज्यादा नजर आता है, जबकि उसे निष्पक्ष रहना चाहिए। इसलिए अब आजादी के पचहत्तर साल बाद ही सही इन प्रश्नों के सही उत्तर खोजना चाहिए और जरूरी हो तो चुनाव आयोग के गठन के नियम-कानूनों में आवश्यक फैरबदल किया जाना चाहिए, क्योंकि अब चुनाव आयोग धीरे-धीरे प्रतिपक्षी दलों का मुख्य निशाना बनता जा रहा है, जो गंभीर चिंता का विषय है। ....और हर चुनाव का संचालन और उसके परिणामों से यह नजर आना चाहिए कि यह संगठन अपनी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपने दायित्च का निर्वहन कर रहा है। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 23 जनवरी /2026