लेख
23-Jan-2026
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हर साल 24 जनवरी को भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस(नेशनल गर्ल चाइल्ड डे) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बालिकाओं के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और समान अवसरों के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह दिन समाज में लड़कियों के प्रति भेदभाव को मिटाने(समाज से लैंगिक भेदभाव को खत्म करने),बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने और उन्हें समाज में समान अधिकार दिलाने के लिए समर्पित है। कहना ग़लत नहीं होगा कि लड़कियों को समान अवसर देकर ही समृद्ध, सुरक्षित और समतावादी समाज बनाया जा सकता है। वास्तव में,यह दिन हमें याद दिलाता है कि आज की बालिका ही देश का उज्जवल भविष्य है। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह दिन 24 जनवरी को इसलिए चुना गया क्योंकि इसी दिन 1966 में इंदिरा गांधी ने भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। यह महिलाओं की शक्ति और नेतृत्व का प्रतीक है। वास्तव में इस दिवस को मनाने की शुरुआत सबसे पहले वर्ष 2008 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा की गई थी।हरियाणा के एक छोटे से गांव बीबीपुर (जींद जिला) से शुरू हुआ यह अभियान(सेल्फी विद डॉटर) अब राष्ट्रीय बालिका दिवस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। हर वर्ष इस दिवस की एक थीम रखी जाती है और पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 2025 की थीम एमपावरिंग गर्ल्स फोर आ ब्राइट फ्यूचर यानी कि उज्ज्वल भविष्य के लिए लड़कियों को सशक्त बनाना रखी गई थी। इसमें लड़कियों के कौशल विकास और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया था। इस साल यानी कि वर्ष 2026 के लिए संभवतः केंद्र और राज्य सरकारें बालिकाओं की शिक्षा, कौशल, सुरक्षा, बालिकाओं का डिजिटल सशक्तीकरण और नेतृत्व क्षमता को मजबूत बनाना जैसे संदेश पर फोकस करेंगी, ताकि हर लड़की को अपने सपनों को साकार करने का मौका मिल सके। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का लापता महिलाएं (मिसिंग विमेन) का सिद्धांत राष्ट्रीय बालिका दिवस की मूल भावना से गहराई से जुड़ा हुआ है। दरअसल, अमर्त्य सेन ने 1990 में एक चौंकाने वाला आंकड़ा दिया कि दुनिया में लगभग 10 करोड़ (100 मिलियन) महिलाएं लापता हैं।इसका असली मतलब यह है कि अगर समाज में स्त्री और पुरुष को समान स्वास्थ्य, पोषण और अवसर मिलते, तो महिलाओं की संख्या आज की तुलना में 10 करोड़ ज्यादा होती। दूसरे शब्दों में कहें तो अमर्त्य सेन का लापता महिलाएं सिद्धांत सीधे तौर पर उन सामाजिक बुराइयों की ओर इशारा करता है, जिन्हें खत्म करने के लिए राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। सेन के अनुसार, समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और पोषण में कमी के कारण करोड़ों लड़कियां जन्म ही नहीं ले पातीं या समय से पहले मृत्यु का शिकार हो जाती हैं, जिससे जनसंख्या के आंकड़ों में उनकी संख्या पुरुषों के मुकाबले काफी कम हो जाती है। राष्ट्रीय बालिका दिवस इसी लापता होने की प्रक्रिया को रोकने का एक बड़ा संकल्प है, जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या को समाप्त करना, लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करना और उनके प्रति समाज की मानसिकता को बदलना है ताकि भविष्य में कोई भी बालिका संसाधनों के अभाव या भेदभाव के कारण समाज के नक्शे से ओझल न हो। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले साल यानी कि वर्ष 2025 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (बीबीबीपी) योजना की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर वर्ष 2025 का समारोह 22 जनवरी से 8 मार्च 2025 तक चलाया गया था, जिसका समापन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस यानी कि 8 मार्च 2025 को हुआ। पिछले ही साल सुकन्या समृद्धि योजना की भी दसवीं वर्षगांठ मनाई गई थी। गौरतलब है कि यह योजना केंद्र सरकार की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ पहल के तहत शुरू की गई एक प्रमुख छोटी बचत योजना है, जो बालिकाओं के सुरक्षित भविष्य, शिक्षा और विवाह के लिए आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है। आज भारत सरकार और राज्य सरकारें बेटियों और महिलाओं के सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएँ चला रही हैं। इनमें क्रमशः बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ(लड़कियों के जन्म पर सकारात्मक सोच, बचपन में स्वास्थ्य सुरक्षा और शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए), सुकन्या समृद्धि योजना(बचत योजना),सबला/किशोरी शक्ति योजना(किशोरियों के पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन कौशल और कौशल प्रशिक्षण को सशक्त बनाने के लिए), प्रगति- तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति (एआईसीटीई-स्कीम),उड़ान योजना (सीबीएसई का मेरिट-आधारित सहायता प्रोग्राम) आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा,ग्रामीण व महिला समुदायों में जागरूकता, प्रशिक्षण और रोजगार-समर्थन के लिए महिला शक्ति केंद्र स्थापित किए गए हैं। केंद्र सरकार ही नहीं देश के विभिन्न राज्यों में आज बालिकाओं/महिलाओं के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रहीं हैं। इनमें क्रमशः पश्चिम बंगाल में कन्याश्री प्राकल्प(यह योजना 13–18 वर्ष की लड़कियों को शिक्षा जारी रखने और विवाह रोकने के लिए वार्षिक छात्रवृत्ति और एक-बार की आर्थिक सहायता प्रदान करती है),मध्य प्रदेश सहित कई राज्य लाडली लक्ष्मी योजना चला रहे हैं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि यह योजना जन्म से लेकर 21 वर्ष की उम्र तक लड़कियों के लिए जमा/वित्तीय सहायता प्रदान करती है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा को लक्ष्य बनाती है। ओडिशा में खुशी योजना एक अन्य योजना है,जो स्कूल-जाने वाली लड़कियों को निशुल्क सैनिटरी पैड प्रदान कर स्वास्थ्य और स्वच्छता सुनिश्चित करती है।इसके अलावा ओडिशा में ही सबहद्रा योजना भी चलाई जा रही है,जो 21-60 वर्ष की महिलाओं को प्रतिवर्ष वित्तीय सहायता प्रदान करने वाली बड़ी महिला-केंद्रित योजना है। वास्तव में यह योजना लड़कियों/महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देती है। इतना ही नहीं,नमो ड्रोन दीदी योजना एक आधुनिक पहल है जिसमें स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं/लड़कियों को कृषि कार्यों के लिए ड्रोन उड़ाने और उनके रखरखाव का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अंत में , राष्ट्रीय बालिका दिवस का मुख्य निष्कर्ष यह है कि समाज में बालिकाओं के प्रति दृष्टिकोण में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है। आज बालिकाएं केवल घरेलू सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहीं हैं, बल्कि आज वे शिक्षा, खेल, अंतरिक्ष , बैंकिंग, सेना, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी जैसे हर क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित कर रही हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज विभिन्न सरकारी योजनाओं और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से लिंगानुपात में बहुत सुधार हुआ है और बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों में अभूतपूर्व कमी आई है। हालांकि, पूर्ण सशक्तीकरण के लिए अभी भी सुरक्षा, पोषण और उच्च शिक्षा के स्तर पर निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। अंततः, यह दिन हमें संकल्प दिलाने का माध्यम है कि एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब बेटियों को समान अधिकार, सुरक्षा और अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा अवसर मिले। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 23 जनवरी 26