लेख
23-Jan-2026
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प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्य और पुलिसवाले आमने-सामने आ गए। फिर जमकर धक्का-मुक्की हुई। इसके बाद शंकराचार्य शिष्यों को छुड़वाने पर अड़ गए।शंकराचार्य के शिष्य की पिटाई हुई एसओजी ने अविमुक्तेश्वरानंद के पालकी को ढकेलकर बाहर निकाला द्वारका पीठ के शंकराचार्य बोले- यह गौ हत्या जैसा पाप ·है और सभी पीठो के शंकराचार्य ने योगी सरकार के कदम का विरोध किया,उधर रामभद्राचार्य बोले- अविमुक्तेश्वरानंद ने अन्याय किया अब कौन क्या बोल रहा है इस पर शांति से काम लेना चाहिए पहली बात तो ऐ है कि कौन भगवान का सच्चा भक्त है ऐ समझ में नहीं आता है मारना पीटना किसी को भी शोभा नहीं देता सीखो भगवान राम से जिन्होंने अपने राज़धर्म में किसी जनता पर अन्याय नहीं किया राम को लेकर आए है और इसलिए हमें भी लाइए कितनी बार मैं सुन चुका हूँ लेकिन ऐसा नहीं सुना की अहम में अपने को ही भूल गए मैं ही सब कष्टों का कारण है इसे आने ना दो।पहले सभी सनातन जो हिन्दू धर्म के हित धारक होते है उनके बारे में कुछ जाने सबसे बड़ा सनातनी में सर्वोच्च भाव त्याग का होता है वो भी परमार्थ हेतु,*मैं* और *मेरा*, इस भाव का त्याग है। फल की इच्छा या भविष्य की कोई चिंता नहीं होती। कर्ताभाव नहीं होता। कोई दुनियवी इच्छा नहीं रहती। संस्कृत में सन्यासी शब्द का अर्थ होता है सम्यक + न्यास = पूर्ण रूप से छोड़ देना। फिर वह कहीं भी रहता हो जंगल या महल में। मन से सब कुछ त्याग चुका होता है। किसी में भी लिप्त नहीं रहता। यह स्थिति कोई रास्ता नहीं है। मंजिल है। इसमें स्थूल त्याग इतना महत्व नहीं रखता। भारतीय अध्यात्म और शास्त्र परंपरा में परिव्राजक और संन्यासी दोनों शब्द त्याग के मार्ग को दर्शाते हैं, लेकिन इनके सूक्ष्म अर्थ और जीवनशैली में कुछ बुनियादी अंतर हैं। इसे आसान भाषा में इस प्रकार समझ सकते हैं: १। परिव्राजक परिव्राजक शब्द का मूल अर्थ है— निरंतर घूमने वाला (परि = चारों ओर, व्राजक = चलने वाला)। * मुख्य विशेषता: परिव्राजक वह है जिसका कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता। वह एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं रुकता (आमतौर पर वर्षा ऋतु को छोड़कर)। * उद्देश्य: इनका मुख्य उद्देश्य ज्ञान का प्रसार करना और स्वयं को मोह-माया से दूर रखने के लिए किसी एक स्थान से जुड़ाव न रखना है। * एक उपमा: उन्हें बहते पानी की तरह माना जाता है जो कभी रुककर गंदा नहीं होता। २। संन्यासी संन्यासी शब्द का मूल अर्थ है— जिसने पूर्ण त्याग कर दिया हो (सम् + न्यास)। * मुख्य विशेषता: संन्यास एक अवस्था या आश्रम है। जब व्यक्ति संसार के सभी कर्तव्यों (गृहस्थ जीवन) से मुक्त होकर स्वयं को परमात्मा या आत्म-ज्ञान के लिए समर्पित कर देता है, तो वह संन्यासी कहलाता है। * उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना और अहंकार का पूर्ण विनाश करना है। संन्यासी एक जगह आश्रम में रहकर भी साधना कर सकता है। दोनों में मुख्य अंतर आधार व परिव्राजक का है संन्यासी में गतिशील, निरंतर भ्रमणशील रहता है (घुमक्कड़)। | एक स्थान पर रुक सकता है (आश्रम या कुटिया में)। | परिव्रज्या यानी घर-बार छोड़कर भ्रमण करना। | न्यास यानी सब कुछ छोड़कर आत्मस्थ होना। | | जिसकी जीवनशैली भिक्षा मांगकर और यात्रा करके जीवन बिताना होता है और ध्यान, तपस्या और शास्त्र चिंतन में लीन रहना। प्राथमिकता में वैराग्य और लोक-शिक्षा के लिए यात्रा करना और त्याग, वैराग्य और मोक्ष के लिए स्थिर साधना करना होता है । | आप कह सकते हैं कि हर परिव्राजक एक संन्यासी होता है, लेकिन हर संन्यासी ज्ञानी हो यह जरूरी नहीं। * यदि एक संन्यासी एक जगह बैठकर तपस्या कर रहा है, तो वह केवल संन्यासी है। * यदि वही संन्यासी गांव-गांव घूमकर ज्ञान बाँट रहा है और कहीं रुकता नहीं है, तो उसे परिव्राजक कहा जाता है। स्वामी विवेकानंद को अक्सर परिव्राजक कहा जाता है क्योंकि उन्होंने पूरे भारत की पैदल यात्रा की थी। क्या आप इन दोनों श्रेणियों में आने वाले किसी विशेष महापुरुष या उनके दर्शन के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं? आचार्य तुलसी ने प्रेक्षा ध्यान को आरंभ किया जिसको अचार्य महाप्रज्ञ ने बहुत ऊंचाई प्रदान की। मैं जैनिज्म पर भी कलेक्शन कर रहा हूं कभी ना कभी पुस्तक लिखूंगा। जैन धर्म को बहुत गहराई से समझा है। उसके गुरुओं का जीवन यदि तुमको मालूम हो जाए तो तुम्हारी आंखों से आंसू आ जाएंगे इतना कष्ट कहते हैं अपने शिष्यों को सुधारने के लिए। दिगंबर ऋषि आचार्य तरुण सागर महाराज ने प्रतिज्ञा की थी तो उन्होंने तबीयत खराब होने पर दवा नहीं ली अपने प्राण त्याग दिए।शक्तिपात परंपरा का हूं उसमें तो उपवास द्वारा भी नहीं है अधिक। इसके अतिरिक्त बंधन मुक्त होने के लिए कुंडलिनी शक्ति का प्रयोग होता है। और मेरी निगाह में भी यह आवश्यक नहीं है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए बंधन मुक्त होना है बंधन नहीं करना है लेकिन यह भी एक परंपरा है सनातन की जिसको कि हमको जानना चाहिए और हमको इन परंपराओं का भी सम्मान करना चाहिए अर्थात हम भले ही ना करें जो नहीं कर रहे हैं उनके लिए अलग बात है लेकिन जो कर रहे हैं उनका सम्मान करना चाहिए। उनके लिए कोई कष्ट देना नहीं होता है इनमें। उनके लिए यह स्वाभाविक हो जाता है। उनकी शक्ति ऐसी है। वह खुशी खुशी यह करते हैं। उनका सामर्थ्य है। लोग इसे कठोरता मानते हैं क्योंकि वह स्वयं कर नहीं सकते और करेंगे तो पीड़ा होती है इसलिए उनको लगता है कि ये जबरदस्ती से कर रहे। जबकि उनके लिए तो ये बिल्कुल स्वाभाविक है।: बहुत साल पहले से चाय पीना छोड़ दिया था। कभी इच्छा भी नहीं होती। जबकि लोग चाय न पिए तो दिन खराब हो जाता है। उनके लिए यह अस्वाभाविक है लेकिन जो चाय नहीं पीते उनके लिए यह स्वाभाविक है। उनकी स्फूर्ति चाय के ऊपर आधारित नहीं है। : जैन मुनि कभी वाहन में नहीं बैठते पदयात्रा करते हैं जीवन भर हम में से कितने लोग करते हैं मॉर्निंग वॉक तो होती नहीं। आचार्य तुलसी जिनको की बाद में गणाधिपति तुलसी की उपाधि दी गई थी उन्होंने इसमें छूट देने का विकल्प रखा था क्योंकि जैन धर्म का प्रचार बिल्कुल नहीं हो पाया लेकिन बहुत से लोग अभी भी नहीं मानते हैं। : 400 साल पहले आचार्य भिक्षुक ने कुछ अन्य मान्यताओं के साथ नया पंथ आरंभ किया था। लेकिन कुल मिलाकर समय के साथ जैन धर्म ने अपनी बंधन को बदलने का प्रयास इक्का-दुक्का किया है और मूल रूप में थोड़ा परिवर्तन हुआ है विचारों का परिवर्तन हुआ है लेकिन जीवन में परिवर्तन बंधन में परिवर्तन नहीं किया है। बौद्ध दर्शन में तो इतना अधिक विघटन हो गया है इतनी अधिक अलग-अलग सोच के सन्यासी पैदा हो गए हैं जो वास्तविकता को लगभग भूल चुके हैं सिर्फ गेरुआ वस्त्र पहन रहे हैं जैसे नव बौद्ध यह जबरदस्ती का पैदा हो किया हुआ एक पंथ है जो महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं से बिल्कुल अलग ही दिखता है। खाने पीने में स्वतंत्रता हिंसा अहिंसा में स्वतंत्रता जीवन की दिनचर्या में स्वतंत्रता महात्मा बुद्ध के विचारों के बिल्कुल प्रतिकूल चलना यह इनका फैशन हो गया है। जैसे हीन यान। यह परंपराओं को लेकर चल रहे हैं लेकिन और दूसरे जो विघटक बने हैं वह आधुनिकता के अनुसार परिवर्तित होते जा रहे हैं। यह सब सनातन ज्ञान की सनातन परंपराओं की सुंदर-सुंदर फूल है फर्क सिर्फ भाषा का था बहुत और जैन पाली में लिखा गया साहित्य है सनातन का साहित्य संस्कृत में। जैसे सांख्य दर्शन के लोग लगभग ईश्वर को नहीं मानते हैं सिर्फ पुरुष के रूप में आत्मा को मानते हैं उसी भांति बौद्ध और जैन में वे ईश्वर के अस्तित्व को ना करते हैं और आत्मा को शक्ति के रूप में मानकर आगे बढ़ते हैं। लेकिन यह सब हमारे भारतीय ज्ञान की धरोहर हैं कि तुम किसी भी क्षेत्र से बढ़ोगे किसी भी दिशा से आगे बढ़ोगे और अगर तुम्हारे अंदर लगन है कुछ करने की इच्छा है तो तुम अवश्य अपने को पहचान जाओगे ब्रह्म क्या है यह जान जाओगे जो हमारे वेदों का लक्ष्य है। जीव की दृष्टि शरीरों तक सीमित रहती है, पहले अपने अंतर में झांक कर, प्रभु दर्शन नहीं कर पाते तो, अन्य जीवों में प्रभु दर्शन कैसे संभव है।जब मन में राग-द्वेष भरा हो तो जगत में नानात्व -भिन्नत्व ही दिखेगा। जब तक हृदय की स्थिरता, कोमलता, निर्मलता, सम्पादित नहीं होती तब तक प्रभु दर्शन नहीं हो पाता।जब तक हृदय रुपी सरोवर में कामनाओं और वासनाओं की आंधी चलती रहती है तब तक हृदय का प्राण रुपी जल भी तरंगें भरता रहता है। हृदय के अंतस्थल में छुपे हुए प्रभु राम का प्रत्यक्षीकरण नहीं होता। साधनावस्था में साधक -भक्त को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि,जो लोग प्रभु शक्ति या प्रभु राम के भक्तों का उपहास करते हैं उनसे दूर ही रहें।: तुम्हारा शरीर भी ब्रह्म का रूप है तुम्हारे अंदर भी ब्रह्म के रूप में जीवात्मा विद्यमान है। मूल रूप में दोनों एक है लेकिन अलग हैं। तुम्हारा शरीर मंदिर है। जीवात्मा उसमें रहने वाला देव क़ोई और नहीं भगवान राम है। उनका नमन करना सीखो मंदिर तो टूटता है फूटता है मेंटेनेंस होता है। लेकिन भगवान राम कभी नष्ट नहीं होता यही समझ कर अपने शरीर का भी ध्यान दो। शरीर एक ऊर्जा है जो कभी नष्ट नहीं होती है जब तक प्राण है तब स्थूल रूप में है जैसे प्राण निकला आत्मा बाहर आती है और सूक्ष्म रूप में कर्मों के अनुसार अन्य जीव में जन्म लेता है और वहाँ भी जीव में सुख दुख तो आते जाते रहते हैं लेकिन राम तटस्थ्य रहता है और सभी जीवों पर उसकी कृपा होती है और जो उसका नाम जपता है वह मोह माया के सारे बंधन से मुक़्त हो जाता है अपने देव भगवान राम की शक्ति को अपनी इच्छा पूर्ति करने का जरिया मत बनाओ। कर्म करो फल अवश्य मिलेगा,उसने मेरी यह इच्छा पूरी नहीं कि मैं नाराज हो गया मैंने ध्यान साधना सब छोड़ दिया मंत्र जप छोड़ दिया क्योंकि मैं नाराज हूं। यदि नाराज भी होते हो तो उसी की शरण में जाओ उसी से झगड़ा करो। क्योंकि उसके अतिरिक्त जगत में तुम्हारा कोई नहीं है यह बात समझ लो। आपको यह भ्रम होता है कि मैं उससे प्रेम करता हूं वह मुझसे प्रेम करता है यह भावना वास्तव में सबसे बड़ी अज्ञानता का प्रतीक है। यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो तो एक समय जब वह कुछ नहीं कर पाता तो उसको मृतक बोल देते हो और घर से बाहर निकालने की जल्दबाजी करते हो यदि उसे प्रेम करते होते तो उसे घर में रख लो ना। लेकिन तुम प्रेम किस कर रहे थे यह सोचो तुम प्रेम उसे कर रही थी जो उसके अंदर विद्यमान जीवात्मा थी जो ईश्वर का अंश है तो अंततः क्या हुआ तुमने प्रेम किया उससे नहीं उसके अंदर विद्यमान जीवात्मा से और उसके जाने के बाद उसकी लकड़ी के टुकड़े की भांति जला दिया। तो क्या वह तुम्हारा प्रेम पवित्र था या वह प्रेम की सीमा थी यह सोचना मूर्खता है सिर्फ हो सकता है वासना के कारण हम उसको प्रेम करते हो क्षणिक आवेग में हमें लगता हो या मुझसे प्रेम करते हैं लेकिन प्रेम तुम सिर्फ ईश्वर से ही करते हो और किसी से नहीं यह बात समझ लो। अतः उप्र में धर्म में आपसी मतभेद को शांति से हल करना चाहिए क्योंकि संत कबीर दास जी कहते हैँ टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार। रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार रहीम का एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसका अर्थ है कि आपको अपने प्रिय और सज्जन लोगों को बार-बार मनाना चाहिए, भले ही वे सौ बार रूठ जाएँ, ठीक वैसे ही जैसे मोतियों की माला टूट जाने पर हम उन मोतियों को फेंकते नहीं बल्कि धागे में पिरोकर फिर से माला बना लेते हैंरहीम का एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसका अर्थ है कि आपको अपने प्रिय और सज्जन लोगों को बार-बार मनाना चाहिए, भले ही वे सौ बार रूठ जाएँ, ठीक वैसे ही जैसे मोतियों की माला टूट जाने पर हम उन मोतियों को फेंकते नहीं बल्कि धागे में पिरोकर फिर से माला बना लेते हैं; यह दोहा अच्छे रिश्तों के महत्व और उन्हें सहेजने की सीख देता है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 23 जनवरी 26