ढाका(ईएमएस)। बांग्लादेश में 12 फरवरी, 2026 को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। अमेरिका की विदेश नीति में आए इस बदलाव ने न केवल बांग्लादेश की राजनीति, बल्कि भारत के सुरक्षा हितों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अमेरिका अब बांग्लादेश की सबसे प्रमुख और विवादित इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी के साथ सीधे संवाद और जुड़ाव के संकेत दे रहा है। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक ने स्थानीय पत्रकारों के साथ गुप्त बैठक में स्वीकार किया कि बांग्लादेश अब इस्लामिक विचारधारा की ओर झुक चुका है। राजनयिक ने पत्रकारों को सुझाव दिया कि वे जमात की छात्र शाखा, इस्लामी छात्र शिविर के सदस्यों को मुख्यधारा के मीडिया कार्यक्रमों में स्थान दें। अमेरिका का मानना है कि जमात अब एक ऐसी राजनीतिक शक्ति बन चुकी है जिसे नजरअंदाज करना असंभव है। हालांकि, अमेरिकी दूतावास ने इसे एक नियमित संवाद बताया है, लेकिन राजनयिकों के इस रवैये से स्पष्ट है कि वॉशिंगटन अब जमात को एक वैध राजनीतिक हितधारक मान रहा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने और उनके भारत जाने के बाद से जमात-ए-इस्लामी की लोकप्रियता में भारी उछाल आया है। अमेरिका स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट के हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 53 प्रतिशत लोगों ने जमात के प्रति अपनी पसंद जाहिर की है। यह पार्टी अब मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को कड़ी टक्कर दे रही है। भ्रष्टाचार विरोधी नारों और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के जरिए जमात ने अपनी पुरानी पाकिस्तान समर्थक छवि को बदलने की कोशिश की है। दूसरी ओर, अमेरिका ने गाजर और छड़ी की नीति अपनाते हुए जमात को चेतावनी भी दी है। अमेरिकी राजनयिकों का कहना है कि यदि जमात सत्ता में आकर शरिया कानून लागू करती है या मानवाधिकारों, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों का हनन करती है, तो बांग्लादेश पर भारी आर्थिक प्रतिबंध और 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिए जाएंगे। चूंकि बांग्लादेश के निर्यात का 20 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जाता है, इसलिए यह चेतावनी सीधे तौर पर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी है। भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। नई दिल्ली ऐतिहासिक रूप से जमात-ए-इस्लामी को संदेह की दृष्टि से देखता रहा है, क्योंकि इस संगठन ने 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा जमात को दी जा रही यह राजनीतिक वैधता भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है। भारत को डर है कि जमात के उदय से बांग्लादेश में कट्टरपंथ बढ़ेगा और अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं की सुरक्षा को खतरा पैदा होगा। जैसे-जैसे फरवरी के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक शक्तियों का यह रुख दक्षिण एशिया की स्थिरता को किस दिशा में ले जाता है। वीरेंद्र/ईएमएस/24जनवरी2026 -----------------------------------