24-Jan-2026
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- आरोपी बरी, लास्ट सीन और परिस्थितिजन्य साक्ष्य नाकाफी, संदेह का मिला लाभ बिलासपुर (ईएमएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल संदेह, कमजोर लास्ट सीन थ्योरी और अपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर किसी को आजीवन कारावास नहीं दिया जा सकता। यह फैसला क्रिमिनल अपील में न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनाया है। क्या था मामला 27-28 जुलाई 2016 की दरम्यानी रात आरोपी टीकाराम निषाद उर्फ टिकम ने ट्रक (क्रमांक सीजी 13 एलए 4893) में सो रहे चालक संतोष निषाद की जैकरॉड से हत्या कर दी थी। इस मामले में 5वें अपर सत्र न्यायाधीश, रायगढ़ ने 27 फरवरी 2017 को आरोपी को धारा 302 भादंवि के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 2000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने क्या कहा हाईकोर्ट ने माना कि संतोष निषाद की मौत हत्या (हॉमिसाइडल डेथ) थी, लेकिन यह साबित करने में अभियोजन पूरी तरह असफल रहा कि हत्या आरोपी ने ही की। कोर्ट ने कहा कि, मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। अभियोजन सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय पंचशील सिद्धांत को पूरा नहीं कर सका। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई लास्ट सीन टुगेदर की थ्योरी को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि, किसी भी गवाह ने स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि घटना के समय आरोपी मृतक के साथ ही मौजूद था। ढाबा संचालक और अन्य गवाहों के बयान आपस में विरोधाभासी हैं। कई गवाहों ने पहले बयान में आरोपी का नाम नहीं लिया। ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिक ने खुद कहा कि उसे नहीं पता कि घटना के दिन कौन हेल्पर था। कोर्ट ने साफ कहा कि ‘लास्ट सीन’ का सिद्धांत तभी लागू होगा जब वह ठोस, स्पष्ट और संदेह से परे हो, जो इस मामले में नहीं है। जब्ती और फरेंसिक रिपोर्ट भी बेकार अभियोजन ने आरोपी की शर्ट, जैकरॉड और तौलिया जब्त करने की बात कही, लेकिन एफएसएल रिपोर्ट रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई। ऐसे में जब्ती अभियोजन के किसी काम की नहीं रही। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि, घटना के बाद फरार होना अपने आप में दोष सिद्ध नहीं करता। झूठा अलिबाई तभी मायने रखता है जब अभियोजन पहले अपराध सिद्ध कर दे। यहां अभियोजन ही असफल रहा, इसलिए ये पहलू आरोपी के खिलाफ नहीं जा सकते। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियों की श्रृंखला अधूरी है और आरोपी की दोषसिद्धि के लिए आवश्यक हर कड़ी नहीं जुड़ती। ऐसे में आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना न्यायसंगत है। मनोज राज/योगेश विश्वकर्मा 24 जनवरी 2026