बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की मजबूती की कहानी भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता केवल एक आर्थिक समझ नहीं है बल्कि यह इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करता है करीब दो दशक तक चली लंबी और जटिल बातचीत के बाद इस समझौते का सामने आना यह दिखाता है कि भारत अब धैर्य रणनीति और आत्मविश्वास के साथ बड़े फैसले लेने की स्थिति में है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया की पुरानी ताकतों पर भरोसा डगमगा रहा है और नई साझेदारियां आकार ले रही हैं। अमेरिका की नीतियों में अनिश्चितता और आक्रामकता ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर किया कि उसे अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए नए भरोसेमंद साथियों की जरूरत है ।वहीं भारत लंबे समय से एक ऐसे साझेदार की तलाश में था जो बराबरी के आधार पर सहयोग करे न कि शर्तों और दबाव के साथ ऐसे माहौल में भारत और यूरोप का एक साथ आना स्वाभाविक भी है और दूरदर्शी भी। यह समझौता उस दौर की उपज है जब चीन सस्ते सामान के जरिए दुनिया के बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है और कई देश इस निर्भरता से निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं। भारत और यूरोप दोनों ही इस बात को समझते हैं कि विविध और संतुलित आपूर्ति श्रृंखला ही भविष्य की कुंजी है इसी सोच ने इस ऐतिहासिक साझेदारी को जन्म दिया। भारत के लिए यह समझौता आर्थिक दृष्टि से कई नए दरवाजे खोलता है यूरोप का विशाल बाजार भारतीय उत्पादों के लिए अब पहले से कहीं ज्यादा सुलभ होगा कपड़ा उद्योग हस्तशिल्प आभूषण वाहन पुर्जे और इंजीनियरिंग से जुड़े उत्पादों को सीधा लाभ मिलेगा इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा बल्कि देश के भीतर उत्पादन और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे छोटे और मध्यम उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ने का अवसर मिलेगा जो अब तक केवल बड़े कारोबारी समूहों तक सीमित था कृषि क्षेत्र के लिए भी यह समझौता उम्मीद की नई किरण है। फल सब्जियां प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और समुद्री उत्पादों को यूरोप में नई पहचान मिलेगी। इससे किसानों और मछुआरों की आमदनी बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। यह केवल व्यापार नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा बदलाव है। सेवा क्षेत्र विशेषकर सूचना तकनीक और डिजिटल सेवाओं के लिए यह समझौता भारत की ताकत को और उभारता है। भारतीय पेशेवरों को यूरोप में काम करने के अधिक अवसर मिलेंगे ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और भारत की युवा शक्ति को वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलेगा। यह भविष्य की उस अर्थव्यवस्था की नींव रखता है जहां ज्ञान कौशल और नवाचार सबसे बड़ी पूंजी होंगे। इस समझौते का महत्व केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है ।भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं रहेगा बल्कि बहुस्तरीय और संतुलित विदेश नीति अपनाएगा यूरोप के साथ यह साझेदारी भारत को वैश्विक राजनीति में एक मजबूत और स्वतंत्र आवाज देती है। यह संदेश जाता है कि भारत अब केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। यह साझेदारी चीन के प्रभाव को संतुलित करने में भी सहायक होगी जब दुनिया चीन पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को समझ रही है तब भारत और यूरोप मिलकर एक भरोसेमंद विकल्प पेश कर सकते हैं इससे वैश्विक कंपनियों का विश्वास भारत पर बढ़ेगा और देश एक प्रमुख उत्पादन केंद्र के रूप में उभरेगा। अब सवाल उठता है कि इस समझौते के बाद अमेरिका की भूमिका क्या होगी आने वाले समय में अमेरिका के लिए यह स्थिति आत्ममंथन की है। भारत लंबे समय से अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साझेदार रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में दबाव और शुल्क आधारित नीतियों ने रिश्तों में सहजता कम की है। भारत ने यह दिखा दिया है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक रास्ते चुन सकता है। भारत के प्रति अमेरिका की सहानुभूति अब पहले जैसी स्वतःस्फूर्त नहीं रहेगी बल्कि व्यावहारिक होगी अमेरिका यह समझेगा कि भारत केवल एक बड़ा बाजार नहीं बल्कि एक स्वतंत्र सोच वाला राष्ट्र है यदि अमेरिका सहयोग सम्मान और बराबरी के आधार पर आगे बढ़ेगा तो भारत के साथ उसके संबंध मजबूत रहेंगे लेकिन यदि दबाव की नीति जारी रही तो भारत के पास अन्य मजबूत विकल्प मौजूद हैं। इस समझौते का अमेरिका पर प्रभाव गहरा लेकिन अप्रत्यक्ष होगा सबसे बड़ा असर यह होगा कि अमेरिका की वैश्विक व्यापार नीति की विश्वसनीयता पर सवाल और मजबूत होंगे यूरोप और भारत का एक साथ आना यह दिखाता है कि दुनिया अब एक ही शक्ति के इर्दगिर्द नहीं घूमती इससे अमेरिका की सौदेबाजी की क्षमता कमजोर हो सकती है। अमेरिकी कंपनियों के लिए भी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी यूरोपीय कंपनियों को भारत में बेहतर पहुंच मिलने से कई क्षेत्रों में चुनौती बढ़ेगी यह स्थिति अमेरिका को अपनी व्यापार नीतियों में लचीलापन लाने के लिए मजबूर कर सकती है। भारत की वैश्विक छवि इस समझौते के बाद और मजबूत हुई है ।दुनिया के बड़े मीडिया संस्थानों ने इसे ऐतिहासिक बताया है यह भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और दीर्घकालिक सोच का प्रमाण है। नेतृत्व की राजनीतिक इच्छाशक्ति ने यह दिखा दिया है कि कठिन बातचीत और लंबे इंतजार के बाद भी बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। यह समझौता भारत को आत्मविश्वास देता है कि वह वैश्विक मंच पर अपने हितों की रक्षा कर सकता है और सहयोग के नए मॉडल पेश कर सकता है यह केवल वर्तमान की जीत नहीं बल्कि भविष्य की तैयारी है। अंततः भारत और यूरोप के बीच यह मुक्त व्यापार समझौता एक नए युग की शुरुआत है यह युग सहयोग संतुलन और साझा मूल्यों का है भारत के लिए यह आर्थिक विकास रोजगार सृजन और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने का मार्ग खोलता है अमेरिका के लिए यह एक संकेत है कि बदलती दुनिया में पुराने तरीके काम नहीं आएंगे।दुनिया अब सहयोग से आगे बढ़ेगी और भारत इस सहयोग का केंद्र बनकर उभर रहा है। कांतिलाल मांडोत/29जनवरी2026