लेख
29-Jan-2026
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- मृत्यु के बाद भी जीवित हैं गांधी (महात्मा गांधी के बलिदान दिवस (30 जनवरी) पर विशेष) आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि है, जिनकी 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी पुण्यतिथि को प्रतिवर्ष ‘बलिदान दिवस’ के रुप में मनाया जाता है। पूरी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले गांधी जी पहले ऐसे इंसान थे, जिनके सम्पूर्ण जीवन ने विश्वभर में अनेक लोगों की जिंदगी पर गहरा प्रभाव डाला। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के साथ साधनों की पवित्रता जैसी जीवनोपयोगी व्यावहारिक बातों की ओर समूची दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। उनकी जिंदगी पर कई फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बन चुकी हैं तथा कई किताबें भी लिखी गई हैं। सही मायनों में गांधी जी के आदर्शों और सिद्धांतों की वजह से वे आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में बसते हैं। उनका कहना था कि स्वयं वो बदलाव बनिए, जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं। महात्मा गांधी के शब्दों में ‘अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है और काम की अधिकता नहीं बल्कि अनियमितता आदमी को मार डालती है।’ अहिंसा को एक विज्ञान बताते हुए गांधी जी का कहना था कि विज्ञान के शब्दकोश में ‘असफलता’ का कोई स्थान नहीं और उस आस्था का कोई मूल्य नहीं, जिसे आचरण में न लाया जा सके। उनका कहना था कि रामायण का पाठ करते रहना व्यर्थ है, यदि आप राम जैसा आचरण नहीं करते। महात्मा गांधी की ईमानदारी, स्पष्टवादिता, सत्यनिष्ठा और शिष्टता के अनेक किस्से प्रचलित हैं, जिनसे उनके महान् व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक मिलती है। ऐसी ही एक घटना दक्षिण अफ्रीका की है। एक प्रसिद्ध व्यापारी रूस्तम जी गांधी जी के मुवक्किल और निकटतम सहयोगी भी थे। वे अपने सभी कार्य अक्सर गांधी जी की सलाह के अनुसार ही किया करते थे। कलकत्ता और बम्बई से तब उनका काफी सामान आता था, जिस पर वे चुंगी चुराया करते थे। उन्होंने यह बात सदैव गांधी जी से छिपाए रखी। एक बार चुंगी अधिकारियों द्वारा उनकी यह चोरी पकड़ ली गई और उनके जेल जाने की नौबत आ गई। वे दौड़े-दौड़े गांधी जी के पास पहुंचे और पूरा वृतांत उन्हें सुना डाला। गांधी जी ने उनकी पूरी बात गौर से सुनने के बाद उन्हें उनके अपराध के लिए कड़ी फटकार लगाते हुए सलाह दी कि तुम सीधे चुंगी अधिकारियों के पास जाकर अपना अपराध स्वयं स्वीकार कर लो, फिर भले ही इससे तुम्हें जेल क्यों न हो जाए। गांधी जी की सलाह मानकर रूस्तम जी तुरंत चुंगी अधिकारियों के पास पहुंचे और अपना अपराध स्वीकार कर लिया। चुंगी अधिकारी उनकी स्पष्टवादिता से प्रसन्न हुए और उन्होंने उन पर मुकद्दमा चलाने का विचार त्यागकर उनसे चुंगी की बकाया राशि से दोगुनी राशि वसूलकर उन्हें छोड़ दिया। गांधी जी एक बार चम्पारण से बतिया रेलगाड़ी में सफर कर रहे थे। गाड़ी में अधिक भीड़ न होने के कारण वे तीसरे दर्जे के डिब्बे में जाकर एक बर्थ पर लेट गए। अगले स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रूकी तो एक किसान उस डिब्बे में चढ़ा। उसने बर्थ पर लेटे हुए गांधी जी को अपशब्द बोलते हुए कहा, ‘यहां से खड़े हो जाओ। बर्थ पर ऐसे पसरे पड़े हो, जैसे यह रेलगाड़ी तुम्हारे बाप की है।’ गांधी जी किसान को बिना कुछ कहे चुपचाप उठकर एक ओर बैठ गए। तभी किसान बर्थ पर आराम से बैठते हुए मस्ती में गाने लगा, ‘धन-धन गांधी जी महाराज! दुःखियों का दुःख मिटाने वाले गांधी जी ...।’ रोचक बात यह थी कि वह किसान कहीं और नहीं बल्कि बतिया में गांधी जी के दर्शनों के लिए ही जा रहा था लेकिन इससे पहले उसने गांधी जी को कभी देखा नहीं था, इसलिए रेलगाड़ी में उन्हें पहचान नहीं सका। बतिया पहुंचने पर स्टेशन पर जब हजारों लोगों की भीड़ ने गांधी जी का स्वागत किया, तब उस किसान को वास्तविकता का अहसास हुआ और शर्म के मारे उसकी नजरें झुक गई। वह गांधी जी के चरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना करने लगा। गांधी जी ने उसे उठाकर प्रेमपूर्वक अपने गले से लगा लिया। एक घटना उस समय की है, जब गांधी जी सश्रम कारावास की सजा भुगत रहे थे। एक दिन जब उनके हिस्से का सारा काम समाप्त हो गया तो वे खाली समय में एक ओर बैठकर एक पुस्तक पढ़ने लगे। तभी जेल का एक संतरी दौड़ा-दौड़ा उनके पास आया और उनसे कहने लगा कि जेलर साहब जेल का मुआयना करने इसी ओर आ रहे हैं, इसलिए वो उनको दिखाने के लिए कुछ न कुछ काम करते रहें लेकिन गांधी जी ने ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया और कहा कि इससे तो बेहतर होगा कि मुझे ऐसे स्थान पर काम करने के लिए भेजा जाए, जहां काम इतना अधिक काम हो कि उसे समय से पहले पूरा किया ही न जा सके। अहिंसा के पुजारी गांधी जी सदैव कहा करते थे कि अपनी बुराई हमेशा सुनें, अपनी तारीफ कभी न सुनें। दरअसल उनका मानना था कि इंसान को अपनी तारीफ से ज्यादा बुराई सुननी चाहिए। गांधी जी का मानना था कि मनुष्य जब एक नियम तोड़ता है तो बाकी अपने आप टूट जाते हैं। वह अक्सर कहा करते थे कि जिस दिन प्रेम की शक्ति, शक्ति के प्रति प्रेम पर हावी हो जाएगी, दुनिया में अमन आ जाएगा। गांधी जी के तीन बंदरों का संदेश ‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो’ आज भी प्रेरणा का स्रोत है। यह उनकी विचारधारा का प्रतीक है कि जीवन में हमें केवल सकारात्मकता को आत्मसात करना चाहिए। (लेखिका डेढ़ दशक से अधिक समय से शिक्षण क्षेत्र में सक्रिय शिक्षाविद हैं) ईएमएस / 29 जनवरी 26