लेख
29-Jan-2026
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महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर उस चौराहे पर आकर खड़ी हो गई है, जहां से सियासी जोड़-तोड़ वाले गठबंधन के साथ ही जीत-हार के अलग-अलग रास्ते नजर आ रहे हैं। दरअसल उप मुख्यमंत्री अजित पवार का एक विमान हादसे में आकस्मिक निधन न केवल एक प्रभावशाली नेता के एक युगा का अंत है, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव भी दिखाई देने लगे हैं। 66 वर्षीय अजित पवार का यूं अचानक चले जाना उस समय हुआ है, जब महाराष्ट्र की राजनीति पहले से ही अस्थिर समीकरणों, टूटे गठबंधनों और बदले हुए सत्ता संतुलन से गुजर रही थी। वैसे तो अजित पवार का राजनीतिक जीवन जितना लंबा और प्रभावशाली नजर आता है, उतना ही विवादों और टकरावों से भरा भी रहा। जुलाई 2023 में उन्होंने अपने चाचा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के संस्थापक शरद पवार के खिलाफ बगावत कर महाराष्ट्र की राजनीति को झकझोर दिया था। आठ अन्य विधायकों के साथ एकनाथ शिंदे और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होकर उन्होंने न केवल एनसीपी को दो हिस्सों में बांट दिया, बल्कि पवार परिवार की राजनीति में भी गहरी दरार डाल दी थी। यह फैसला शरद पवार के लिए राजनीतिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी बड़ा झटका माना गया था। तब अजित पवार का तर्क था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश आगे बढ़ रहा है और महाराष्ट्र की प्रगति के लिए भाजपा के साथ जाना जरूरी है। लेकिन शरद पवार ने इसे सत्ता का दुरुपयोग बताते हुए जनता के बीच जाने का रास्ता चुना। 2023 के बाद से दोनों चाचाभतीजे अलग-अलग राजनीतिक राहों पर चल पड़े। 2024 के लोकसभा चुनावों में अजित पवार की एनसीपी कमजोर साबित हुई, लेकिन उसी वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने 41 सीटें जीतकर खुद को एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर लिया। इसके उलट शरद पवार की एनसीपी (एसपी) केवल 10 सीटों पर सिमट गई। अजित पवार का निधन ऐसे समय हुआ है, जब वे एक बार फिर पूरी पार्टी की कमान संभाले हुए थे और जिला परिषद व पंचायत समिति चुनावों के लिए प्रचार में जुटे थे। माना जा रहा था कि इन स्थानीय चुनावों में वे अपने चाचा शरद पवार के साथ किसी समझौते की ओर बढ़ सकते हैं, लेकिन अब यह संभावना भी समाप्त हो गई है। वैसे इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि अजित पवार के अचानक यूं जाने के बाद सहानुभूति की लहर शरद पवार के पक्ष में जा सकती है, खासकर मराठा समुदाय के बीच। यह अलग बात है कि महाराष्ट्र में मराठा राजनीति पहले से ही कमजोर पड़ती दिख रही है। खेती, सहकारिता, शिक्षा और बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में मराठा वर्चस्व धीरे-धीरे घटा है। भाजपा के उभार के बाद यह भावना और मजबूत हुई है कि पारंपरिक मराठा नेतृत्व हाशिये पर जा रहा है। ऐसे में शरद पवार के लिए यह क्षण भावनात्मक और राजनीतिक दोनों रूप से अवसर लेकर आ सकता है। ग्रामीण महाराष्ट्र में अब भी मराठा समाज की पकड़ है और अजित पवार के निधन से उपजी सहानुभूति शरद पवार को फिर से प्रासंगिक बना सकती है। हालांकि सत्ता के गणित की बात करें तो अजित पवार के निधन से तत्काल सरकार पर कोई खतरा नहीं दिखता। दरअसल 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास 132 सीटें हैं और शिवसेना (शिंदे गुट) के 57 विधायक हैं। अजित पवार गुट की एनसीपी के 41 विधायक भले ही सरकार से अलग हो जाएं, फिर भी सरकार के पास बहुमत बना रहेगा। बहरहाल यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति केवल संख्या का खेल नहीं होती, भावनाएं और सामाजिक समीकरण भी उतने ही अहम होते हैं। अजित पवार लंबे समय से मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए थे। 2004 से ही वे खुद को उस पद के लिए उपेक्षित मानते रहे और यही निराशा अंततः विद्रोह में बदली। उनका निधन उस अधूरे सपने के साथ हुआ, जिसे वे कभी पूरा नहीं कर पाए। आज जब वे राजकीय सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं, महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि अजित पवार की अनुपस्थिति में उनकी एनसीपी किस दिशा में जाती है और क्या शरद पवार इस सहानुभूति को राजनीतिक पुनरुत्थान में बदल पाते हैं। इतना तय है कि यह हादसा केवल एक नेता का अंत नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति के अगले अध्याय की शुरुआत भी है। ईएमएस / 29 जनवरी 26