लेख
29-Jan-2026
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अल्बर्ट आइंस्टीन ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के बारे में एकबार यह कहा था कि-आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस का ऐसा इंसान धरती पर कभी चला होगा।वास्तव में, यह कथन गांधी जी के असाधारण व्यक्तित्व और उनके नैतिक प्रभाव को दर्शाता है। 30 जनवरी का दिन बलिदान, शांति और मानवता की सेवा का प्रतीक है। पाठक जानते होंगे कि 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का निधन हुआ था और उनकी पुण्यतिथि पर यह दिन देशभर में शहीद दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। गांधी जी के सिद्धांत और आदर्श आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में हिंसा, अत्याचार, असहिष्णुता, भ्रष्टाचार, उपभोक्तावाद और पर्यावरण संकट से जूझती दुनिया में सत्य, अहिंसा, संयम और आत्मनिर्भरता जैसे गांधीवादी मूल्य पहले से कहीं अधिक महत्व रखते हैं।पाठक जानते हैं कि आज विश्व के अनेक हिस्सों में सामाजिक टकराव, धार्मिक तनाव और युद्ध जैसी स्थितियाँ बनी हुई हैं, जो पूरी मानवता के लिए कहीं न कहीं एक गंभीर चुनौती हैं। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो मध्य-पूर्व में तनाव, अमेरिका-ईरान संबंधों में बढ़ती तल्खी, ताइवान संकट, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता, यमन का लंबा नागरिक युद्ध, म्यांमार में रोहिंग्या संकट, ईरान-इज़राइल के बीच प्रॉक्सी युद्ध और काफी समय से रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसी घटनाएँ हमारे सामने हैं। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि दुनिया निरंतर संघर्ष और अशांति की ओर बढ़ रही है। भारत की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। मणिपुर में मेइतेई और कुकी-नागा समुदायों के बीच जातीय और सामाजिक संघर्ष जारी है, जिससे हिंसा और असुरक्षा का वातावरण बना हुआ है। ऐसे हालात में संवाद, सहनशीलता और अहिंसा का रास्ता ही स्थायी समाधान की ओर ले जा सकता है, और यही गांधी जी का मूल संदेश था। अहिंसा गांधी जी का सबसे बड़ा सिद्धांत था। उनका विश्वास था कि हिंसा से नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और सहनशीलता से ही स्थायी परिवर्तन संभव है। सत्य उनके जीवन का मूल मंत्र था। वे कहते थे-सत्य ही ईश्वर है। उनके लिए सत्य केवल शब्द नहीं, बल्कि अंतरात्मा की आवाज था। आज जब फेक न्यूज़ और भ्रष्टाचार समाज को कमजोर कर रहे हैं, तब गांधी जी का सत्य और नैतिकता का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। पाठकों को बताता चलूं कि गांधी जी ने सत्य और अहिंसा पर आधारित संघर्ष को सत्याग्रह कहा। उनका मानना था कि नैतिक बल के माध्यम से अन्याय का विरोध किया जा सकता है। उन्होंने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिया। खादी, चरखा और हस्तशिल्प उनके लिए केवल प्रतीक नहीं थे, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता और श्रम की प्रतिष्ठा के माध्यम थे। आज का ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ इसी गांधीवादी सोच का आधुनिक रूप है। सामाजिक समानता और न्याय गांधी जी के विचारों का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। उन्होंने छुआछूत, ऊँच-नीच और हर प्रकार के भेदभाव का विरोध किया और हर व्यक्ति को समान अधिकार और सम्मान देने की बात कही। वे स्वयं सादगी और संयम में विश्वास रखते थे। उनका ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ का सिद्धांत उपभोक्तावाद और पर्यावरण संकट के दौर में संतुलन का रास्ता दिखाता है। गांधी जी का अंत्योदय और सर्वोदय का विचार यह सिखाता है कि विकास तभी सार्थक है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। उन्होंने सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान का भाव रखा और निडर होकर सत्य के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा दी। उनके लिए नैतिक साहस शारीरिक शक्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि महात्मा गांधी केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे आज की विश्व की विभिन्न समस्याओं-जैसे कि हिंसा, असहिष्णुता, स्वार्थ और असमानता आदि का सटीक व बेहतर समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। वे एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति थे। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 29 जनवरी 26