राज्य
29-Jan-2026


- भाजपा का मिशन 2028 भोपाल (ईएमएस)। मप्र में 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा बड़ा दांव लगाने जा रही है। वह अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के युवाओं को साधने की रणनीति पर काम कर रही है। अपनी रणनीति के तहत भाजपा इस वर्ग के युवाओं को राजनीति में सक्रिय भूमिका देकर बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिश करेगी। गौरतलब है कि प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 82 सीटें इन दोनों वर्गों के लिए आरक्षित हैं। वहीं अन्य सीटों पर भी इनका प्रभाव है। ऐसे में भाजपा एससी-एसटी युवाओं पर दांव लगाकर बड़ा राजनीतिक खेल करने जा रही है। दरअसल, जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह द्वारा सैन्य अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के विरुद्ध की गई अमर्यादित बयानबाजी से उत्पन्न संकट से निपटने के साथ पार्टी अब एससी-एसटी वर्ग में भी पीढ़ी परिवर्तन की तैयारी कर रही है। केंद्रीय नेतृत्व भी विजय शाह की अनर्गल टिप्पणी से नाराज है। नेतृत्व द्वारा भी आदिवासी वर्ग में नए नेताओं को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। पार्टी ने आदिवासी चेहरों की कमी को देखते हुए ही सावित्री ठाकुर और दुर्गादास उइके को मोदी सरकार में राज्यमंत्री बनाया है। अब मप्र में भाजपा अब एससी व एसटी के युवा और नए चेहरों को आगे बढ़ाएगी। ऊर्जावान नेताओं की कमी के अलावा भी कई कारण हैं, जिसके चलते अब भाजपा एससी-एसटी दोनों वर्गों में ही नया नेतृत्व खड़ा करना चाहती है। इसकी झलक संभावित मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर राजनीतिक नियुक्तियों में दिख सकती है। एससी-एसटी वर्ग में नए नेतृत्व की खोज दरअसल, भाजपा में पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते को छोड़ दिया जाए तो कोई ऐसा आदिवासी नेता नहीं है, जिसकी प्रदेश के सभी अंचलों पर पकड़ हो। दोनों केंद्रीय मंत्री भी अब तक पूरे प्रदेश में अपनी पहचान बनाने में सफल नहीं है। पाए। वे अपनी लोकसभा क्षेत्र तक ही सीमित हैं। कांग्रेस छोडकऱ भाजपा में आए नेता दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद से भाजपा बड़े आदिवासी चेहरे की कमी से जूझ रही है। महिला नेत्री रंजना बघेल भी वर्ष 2018 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद से हाशिये पर हैं। पार्टी ने राज्यसभा सदस्य सुमेर सिंह सोलंकी को आगे बढ़ाया लेकिन वे कोई परिणाम नहीं दे पाए। अब उन्हें प्रदेश संगठन में महामंत्री बनाया गया है। कुछ ही दिनों में उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। लंबे समय से आदिवासी चेहरे के नाम पर विजय शाह मंत्री जरूर हैं, लेकिन उनकी निमाड़ के बाहर कोई पकड़ नहीं है। राजघराने से होने के कारण आदिवासियों के बीच उनका प्रभाव नहीं है। इसी वर्ग से ओमप्रकाश धुर्वे को राष्ट्रीय पदाधिकारी बनाया गया लेकिन वे भी प्रदेश में कोई पहचान नहीं बना पाए। भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष गजेंद्र सिंह पटेल को भी पार्टी ने आगे बढ़ाया, पर वे खरगोन संसदीय क्षेत्र से दो बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी सक्रिय नहीं हैं। संपतिया उइके को भी भाजपा ने मंडला की जिला पंचायत अध्यक्ष से राज्यसभा सदस्य बनाया और फिर कैबिनेट मंत्री। लेकिन वे भी भ्रष्टाचार के विवाद में फंस गईं। भाजपा छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा विधानसभा सीट से कमलेश शाह को भी कांग्रेस से लाई है ताकि उन्हें भी आगे बढ़ाया जा सके। इसी तरह एससी वर्ग में भी नेतृत्व का टोटा है। केंद्रीय मंत्री रहे थावरचंद गहलोत को कर्नाटक का राज्यपाल बनाए जाने के बाद से उनका विकल्प नहीं बन पाया है। पार्टी ने लालसिंह आर्य को एससी मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है ताकि उन्हें प्रदेश में आगे बढ़ाया जा सके। इसी वर्ग से राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के बार- बार विवादों में आने के बाद पार्टी उनसे भी निराश है। ऐसी स्थिति में नए युवाओं को आगे लाना चाहती है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का कहना है कि भाजपा समय- समय सभी वर्गों में युवा पीढ़ी को आगे लाने का काम करती है। एससी-एसटी वर्ग में भी भाजपा नई पीढ़ी को आगे बढ़ा रही है। इसके साथ हम सभी वर्गों के युवाओं को अलग- अलग दायित्व के माध्यम से आगे ला रहे हैं। प्रदेश में आदिवासी वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए भाजपा और कांग्रेस के बीच जोर-आजमाइश चलती रहती है। इसी क्रम में कांग्रेस ने भी आदिवासी वर्ग पर फोकस बढ़ा दिया है। पार्टी अगले तीन वर्ष में प्रदेशभर में पांच हजार आदिवासी युवाओं की टीम तैयार कर रही है। विनोद / 29 जनवरी 26