सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे के जन्म के समय और विवाह के अवसर पर राई नृत्य का आयोजन प्रतिष्ठा मूलक माना जाता है भोपाल(ईएमएस)। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य,गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि संभावना का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 01 फरवरी, 2026 को अजय कुमार बेड़िया – सागर द्वारा बेड़िया नृत्य, लेखपाल धुर्वे एवं साथी-डिण्डोरी द्वारा गोण्ड जनजातीय गुदूमबाजा नृत्य, सुश्री अर्चना खरे एवं साथी-भोपाल द्वारा बुन्देली गायन, सुश्री अर्चना सिंह एवं साथी -रीवा द्वारा बघेली गायन की प्रस्तुति दी गई। गतिविधि में सुश्री अर्चना खरे एवं साथी-भोपाल द्वारा बुन्देली गायन किया। उन्होंने देवी भजन, बिजना एवं वर्षा गीत, दादरा के साथ अन्य पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति दी। अगले क्रम में सुश्री अर्चना सिंह ने भी देवी भजन से शुरूआत कर विवाह गीत, सोहर एवं अन्य लोक गीतों की प्रस्तुति दी। बेड़िया नृत्य बुन्देलखण्ड अंचल की अपनी जातीय परम्परा मूलतः शौर्य और श्रृंगार परक है। यह अकारण नहीं है कि बुन्देलखण्ड के प्रख्यात लोकनृत्य राई में एक ओर तीव्र शारीरिक चपलता, बेग, अंग, मुद्राएं और समूह के लयात्मक विन्यास है, वहीं दूसरी ओर नृत्य के लास्य का समावेश और लोक कविता के रूप में उद्याम श्रृंगार परक अर्थों की नियोजना। उसमें ऊर्जा, शक्ति और लालित्य एकमेक है। इस नृत्य को बुन्देलखण्ड में मंचीय नृत्य की स्थिति मात्र में सीमित नहीं किया गया है। बल्कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे के जन्म के समय और विवाह के अवसर पर राई नृत्य का आयोजन प्रतिष्ठा मूलक माना जाता है। अनेक बार किसी अभीप्सित कार्य की पूर्ति होने या मनौती होने पर भी राई के आयोजन किये जाते हैं। राई एक जीवन्त कलात्मक हिस्सेदारी की तरह ही है। जीवन का अटूट हिस्सा जिसमें आनंद की स्वच्छंद अभिव्यक्ति मनुष्य की जीवनी शक्ति जैसा प्रकट होता है। राई के दानों की तरह थिरकने के कारण भी इस नृत्य को राई नृत्य कहा जाता है। गुदुमबाजा नृत्य गुदुमबाजा नृत्य गोण्ड जनजाति की उपजाति का पारम्परिक नृत्य है। इस जनजाति में गुदुम वाद्य वादन की भी सुदीर्घ परम्परा है। गुदुम, डफ, मंजीरा, टिमकी आदि वाद्यों के साथ शहनाई की धुनों पर वादन एवं नर्तन किया जाता है। विशेषकर विवाह एवं अन्य अनुष्ठानिक अवसरों पर इस जाति के कलाकारों को मांगलिक वादन के लिए अनिवार्य रूप से आमंत्रित किया जाता है। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय़ में हर रविवार दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति के साथ ही देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा। हरि प्रसाद पाल / 01 फरवरी, 2026