लेख
03-Feb-2026
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केंद्र सरकार के वर्ष 2025–26 के बजट के प्रावधान से साफ़ संकेत मिलता है, देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में है। बजट में घोषित बड़ी योजनाओं और आँकड़ों के पीछे जो सच्चाई छिपी है, उसमें खर्च में कटौती, कम आय सरकार की लिए गंभीर चुनौती है। सरकार ने जिन क्षेत्रों को विकास का इंजन बताया था, उन्हीं क्षेत्रों में सबसे अधिक धनराशि आवंटन में कटौती की गई है। डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट, शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना सरकार के लिए गंभीर चुनौती है। सबसे पहले केंद्र सरकार के राजस्व प्राप्ति पर नज़र डालें, तो बजट अनुमान के मुकाबले लगभग 78 हज़ार करोड़ रुपये का कम राजस्व सरकार के खजाने में आया है। यह आर्थिक मंदी का सीधा संकेत है। नेट टैक्स कलेक्शन भी अनुमान से करीब 1.62 लाख करोड़ रुपये कम प्राप्त हुआ है। जो बताता है, देश में उपभोग नहीं बढ़ रहा है। सरकार ने जीएसटी की दरों में कमी की थी, उसके बाद भी बाजार में मांग नहीं बढ़ी है। ना ही पिछले महीने में व्यापारिक गतिविधियों में कोई सुधार हुआ है। सरकार ने कुल मिलाकर बजट में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के खर्च में कटौती की है। हैरानी की बात यह है, कि कैपिटल एक्सपेंडिचर जो रोज़गार और बुनियादी ढांचे का मूल आधार माना जाता है, उसमें भी लगभग 1.44 लाख करोड़ रुपये की कटौती बजट में की गई है। यह सरकार के उस दावे के विपरीत है, जिसमें सरकार विकासोन्मुख बजट का दावा करती है। केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में करीब 3,686 करोड़ रुपये घटाए हैं। यह ऐसे समय में कटौती की गई है, जब देश में दूषित पानी, कुपोषण और महामारी के बाद की चुनौतियों से जूझ रहा है। इंदौर में दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत दूषित पानी पीने के कारण हुई है। शिक्षा बजट में भी सरकार ने 6,700 करोड़ रुपये से अधिक की कटौती की है। युवाओं और मानव संसाधन विकास के लिए यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। इसी तरह कृषि क्षेत्र पर देश की आधी से ज़्यादा आबादी निर्भर है। उसमें भी करीब 7,000 करोड़ रुपये बजट में कम कर दिए हैं। इस बजट में सबसे ज़्यादा चोट ग्रामीण विकास पर पड़ी है। जहाँ 53,000 करोड़ रुपये से अधिक की कटौती की गई है। प्रधानमंत्री आवास योजना में 3,200 करोड़ रुपये कम आवंटन किया गया है, जिससे गरीबों के घर का सपना और भी दूर हो गया है। जल जीवन मिशन और पेयजल योजनाओं में बजट आवंटन का महज़ 2 प्रतिशत ही केंद्र सरकार ने खर्च किया है। जबकि दूषित पानी से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ी है। इसके लिए ज्यादा राशि के आवंटन की जरूरत थी। सबसे चिंताजनक स्थिति एससी, एसटी और ओबीसी कल्याण योजनाओं की गई कटौती है। अनुसूचित जाति की अभ्युदय योजना में 890 करोड़ की कटौती की गई है। ओबीसी छात्रवृत्ति में 690 करोड़, दलित पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप में 360 करोड़ आदिवासी विकास कार्यक्रम में 1,600 करोड़ से अधिक की कटौती की गई है। जो इस बात का स्पष्ट संदेश है, बजट कटौती के सहारे सरकार अपनी आय और खर्च के बीच के अंतर को सँभालने का प्रयास कर रही है। वर्तमान बजट में अर्थव्यवस्था में ठहराव देखने को मिल रहा है। प्रतिवर्ष टैक्स में जो वृद्धि हो रही थी, उसमें अब ठहराव आ गया है। अर्थव्यवस्था को बेहतर बताने के लिए सरकार ने 4.4 प्रतिशत का फिजिकल डेफिसिट बजट में रखा है। जो अर्थव्यवस्था के लिए संतोषजनक माना जा रहा है। लेकिन जिस तरह से स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और सामाजिक क्षेत्र के बजट को कम किया गया है, उसे सरकार की उपलब्धि तो नहीं माना जा सकता है। वर्ष 2026-27 के बजट से रोज़गार की समस्या के निदान का कोई हल निकलेगा, यह बजट में दिख नहीं रहा है। डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये और विदेशी निवेशकों का बाहर निकलने की चिंता इस बजट में दिख रही है। यह बजट वर्तमान की अर्थव्यवस्था में ज़मीनी सच्चाइयों के अनुसार नहीं है, यह कहा जा सकता है। सरकार ने आलोचनाओं से बचने और सरकार की आर्थिक स्थिति बेहतर बताने के लिए जो बजट प्रस्तुत किया है, वह वास्तविकता से दूर है। बजट किसानों, छात्रों, अल्पसंख्यक वर्ग की समस्या, वर्तमान की तुलना में और भी बढ़ेगी। इस बजट से यह संदेश मिल रहा है। सरकारी खजाने की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के ऊपर कर्ज और ब्याज का बोझ है। पिछले दो दशक से केंद्र एवं राज्य सरकारों की आय में हर वर्ष जो वृद्धि हो रही थी उसमें अब ठहराव आने लगा है । कर्ज और ब्याज का बोझ केंद्र एवं राज्य सरकारों के ऊपर प्रति वर्ष बढ़ रहा हैा बजट का 25 से 40 फ़ीसदी कर्ज और ब्याज की अदायगी पर पहुंच गया है। जिसके कारण आगे चलकर केंद्र एवं राज्य सरकारों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा। केंद्र सरकार के 2026-27 के बजट में स्पष्ट संकेत मिलने लगे हैं। ईएमएस / 03 फरवरी 26