शनिवार शाम महाराष्ट्र की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुँचेगी, जहाँ सत्ता, संवेदना और संगठन तीनों की कसौटी एक साथ होगी। अजित पवार के आकस्मिक निधन से खाली हुए उपमुख्यमंत्री पद पर उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार का शपथ ग्रहण सिर्फ एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महायुति सरकार के लिए एक भावनात्मक, राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौती भी है। यह शपथ एक नई भूमिका की शुरुआत है, जिसमें सुनेत्रा पवार को न केवल सरकार में जिम्मेदारी निभानी होगी, बल्कि उस राजनीतिक विरासत को भी संभालना होगा, जिसे अजित पवार अपने पीछे छोड़ गए हैं। सुनेत्रा पवार का अब तक का सार्वजनिक जीवन राजनीति से अलग समाजसेवा और संस्थागत कामों में अधिक दिखा है। पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाला एनवायर्नमेंटल फोरम इंडिया, बारामती हाईटेक टेक्सटाइल पार्क के जरिए महिलाओं को रोजगार, विद्या प्रतिष्ठान और पुणे विश्वविद्यालय की सीनेट जैसी संस्थाओं में उनकी भूमिका यह सब उन्हें एक प्रशासनिक समझ और सामाजिक संवेदनशीलता देने वाला अनुभव रहा है। लेकिन उपमुख्यमंत्री का पद इन सब से कहीं अधिक जटिल है। यहाँ फैसले सिर्फ फाइलों पर नहीं, सत्ता के संतुलन और राजनीतिक संकेतों पर भी असर डालते हैं। अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी के भीतर जो शून्य पैदा हुआ है, वह केवल एक पद का नहीं है। अजित पवार छह बार उपमुख्यमंत्री रहे, पार्टी संगठन के भीतर उनका नियंत्रण, पश्चिमी महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी पकड़ और महायुति सरकार में उनका महत्व इन सबका विकल्प ढूँढना आसान नहीं। ऐसे में सुनेत्रा पवार का नाम सामने आना भावनात्मक रूप से स्वाभाविक और राजनीतिक रूप से व्यावहारिक माना गया। विधायक दल की बैठक में उनके नाम का प्रस्ताव और त्वरित सहमति यह बताती है कि पार्टी फिलहाल स्थिरता चाहती है, प्रयोग नहीं। हालाँकि, यह स्थिरता अस्थायी भी हो सकती है। सुनेत्रा पवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे केवल एक संवेदनात्मक विकल्प बनकर रहेंगी या धीरे-धीरे पार्टी की सक्रिय राजनीतिक धुरी भी बनेंगी। उनकी शपथ के बाद यह चर्चा तेज है कि क्या वे एनसीपी के दोनों गुटोंअजित पवार गुट और शरद पवार गुट के एकीकरण के प्रयासों को आगे बढ़ाएँगी या फिलहाल सरकार और प्रशासन पर ही फोकस रखेंगी। एनसीपी का विभाजन जुलाई 2023 में हुआ था और तब से पार्टी दो ध्रुवों में बँटी रही। एक ओर शरद पवार के नेतृत्व वाला विपक्षी गुट और दूसरी ओर अजित पवार का सत्तारूढ़ महायुति में शामिल गुट। पिछले कुछ महीनों में दोनों गुटों के बीच बातचीत की खबरें आती रही हैं। खुद शरद पवार यह संकेत दे चुके हैं कि उनके दिवंगत भतीजे की इच्छा पार्टी के एकीकरण की थी। ऐसी स्थिति में सुनेत्रा पवार का उपमुख्यमंत्री बनना केवल सरकार का निर्णय नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य से भी जुड़ा कदम माना जा रहा है। लेकिन राजनीति में इच्छा और हकीकत के बीच फासला होता है। शपथ के तुरंत बाद सुनेत्रा पवार के सामने राज्य का बजट, विभागों का बँटवारा और महायुति के भीतर संतुलन जैसे तात्कालिक मुद्दे होंगे। यह भी लगभग तय है कि वित्त विभाग फिलहाल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास रहेगा। ऐसे में सुनेत्रा पवार की भूमिका प्रारंभिक दौर में सीमित लेकिन प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होगी। वे सरकार में एनसीपी की मौजूदगी का चेहरा होंगी, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी अपने सबसे प्रभावशाली नेता को खो चुकी है। एनसीपी के एकीकरण का सवाल भावनात्मक जरूर है, लेकिन राजनीतिक गणित से भी जुड़ा है। यदि दोनों गुट एक होते हैं, तो महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन बदल सकता है। एक संयुक्त एनसीपी के पास लोकसभा और विधानसभा में मजबूत संख्या होगी, जो या तो महायुति में अपनी शर्तें मजबूत कर सकती है या विपक्षी महाविकास अघाड़ी के समीकरणों को नया रूप दे सकती है। लेकिन यह फैसला सुनेत्रा पवार अकेले नहीं कर सकतीं। इसके लिए शरद पवार, पार्टी के वरिष्ठ नेता, विधायक और जमीनी कार्यकर्ताओं की सहमति जरूरी होगी। शपथ ग्रहण के बाद सुनेत्रा पवार की सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि वे खुद को अजित पवार की पत्नी की पहचान से आगे कैसे ले जाती हैं। राजनीति में सहानुभूति अक्सर शुरुआती समर्थन देती है, लेकिन लंबे समय तक टिकने के लिए निर्णय क्षमता और नेतृत्व जरूरी होता है। बारामती से लोकसभा चुनाव हारने का अनुभव उन्हें यह भी सिखा चुका है कि पवार उपनाम अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है। अब उनके पास मौका है कि वे प्रशासनिक कामकाज और राजनीतिक संवाद के जरिए अपनी अलग पहचान बनाएं। पार्टी के भीतर भी उनकी भूमिका को लेकर मिश्रित भावनाएँ हैं। कुछ नेता उन्हें एक सेतु के रूप में देख रहे हैं, जो अजित पवार गुट और शरद पवार गुट के बीच संवाद का रास्ता खोल सकती हैं। वहीं कुछ का मानना है कि फिलहाल एकीकरण से ज्यादा जरूरी सरकार में स्थिरता और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारी है। ऐसे में संभव है कि सुनेत्रा पवार शुरुआत में संयम और प्रतीक्षा की नीति अपनाएँ। महाराष्ट्र की राजनीति में यह पहला मौका है जब कोई महिला उपमुख्यमंत्री बनेगी। यह तथ्य अपने आप में ऐतिहासिक है और सुनेत्रा पवार की जिम्मेदारी को और बढ़ा देता है। उनसे यह उम्मीद भी की जाएगी कि वे महिलाओं, सामाजिक मुद्दों और विकास से जुड़े सवालों पर एक अलग दृष्टिकोण रखें। लेकिन राजनीति में प्रतीक से अधिक महत्वपूर्ण होता है परिणाम। शपथ के बाद उनके हर कदम को इस नजर से देखा जाएगा कि वह पार्टी को जोड़ता है या सिर्फ समय खरीदता है। अंततः, आज शाम की शपथ एक अंत नहीं, बल्कि एक शुरुआत है। यह शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब एनसीपी भावनात्मक रूप से कमजोर और राजनीतिक रूप से निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सुनेत्रा पवार के सामने चुनौती केवल उपमुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने की नहीं, बल्कि उस विरासत को दिशा देने की है, जिसे अजित पवार अधूरा छोड़ गए। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि वे इस जिम्मेदारी को सिर्फ निभाती हैं या उसे नया अर्थ भी देती हैं। (L103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 04 फरवरी 26