हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में एक अत्यंत गूढ़ और सार्थक पंक्ति कही गई है-मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसका आशय यह है कि जीवन में हार और जीत का वास्तविक निर्धारक बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि मन की स्थिति होती है। परिस्थितियाँ तो केवल माध्यम हैं, असली निर्णायक की भूमिका तो मनुष्य मन निभाता है। यदि मन डर, शंका और निराशा से घिरकर पहले ही हार मान ले, तो साधन, संसाधन और अवसर होते हुए भी पराजय निश्चित हो जाती है। इसके विपरीत, यदि मन दृढ़, साहसी, सकारात्मक और विश्वास से भरा हो, तो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी जीत संभव हो जाती है। वास्तव में, जीवन की हर हार और जीत पहले मन में घटती है, उसके बाद वास्तविक जीवन में दिखाई देती है। जो व्यक्ति मन से हार जाता है, वह कभी जीत नहीं सकता,लेकिन जिसने मन में यह ठान लिया कि वह जीतेगा और हर हाल में जीतेगा, वह अंततः विजयी होता ही है। हमारी पराजय या विजय शारीरिक शक्ति पर नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता पर निर्भर करती है। जब हम मन से यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम नहीं जीत सकते, उसी क्षण हमारी आधी शक्ति समाप्त हो जाती है। वहीं अटूट विश्वास हमें कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी रास्ता दिखा देता है। याद रखिए कि भय मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। भय से ही चिंताओं का जन्म होता है और ये चिंताएँ अक्सर अनावश्यक कल्पनाओं से उपजती हैं। जब व्यक्ति उन बातों की कल्पना करने लगता है, जो अभी घटित ही नहीं हुई हैं, तो उसके भीतर भय पैदा होता है। यही भय उसे सकारात्मक सोचने, आगे बढ़ने और पूर्ण रूप से जीने से रोक देता है।मनुष्य विशेष रूप से उन चीज़ों से अधिक डरता है, जिन्हें वह देख नहीं सकता। जो संकट अभी आया ही नहीं है-अर्थात भविष्य की चिंता-वह मन में एक ‘भूत’ की तरह होता है। उसका कोई निश्चित आकार नहीं होता, इसलिए वह और अधिक डरावना प्रतीत होता है। यह अनदेखा डर व्यक्ति को भीतर ही भीतर भयभीत करता रहता है और अंततः वह बिना लड़े ही हार मान लेता है।इसके विपरीत, जो व्यक्ति इन आशंकाओं से ऊपर उठकर संकल्प करता है, मेहनत करता है और संघर्ष करता है, वह बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को भी पार कर लेता है। इतिहास इसके अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। उदाहरण के तौर पर अरुणिमा सिन्हा ने एक दुर्घटना में अपना पैर खो देने के बावजूद मन से हार नहीं मानी और विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह किया। अब्राहम लिंकन जीवन में कई चुनाव हारने के बाद भी विचलित नहीं हुए और अंततः अमेरिका के राष्ट्रपति बने। ये उदाहरण सिद्ध करते हैं कि परिस्थितियाँ नहीं, मनुष्य का मन ही उसकी नियति तय करता है। वास्तव में मनुष्य मन जानता है कि संकटों से कैसे निपटना है, लेकिन मन चंचल भी होता है। नकारात्मक ऊर्जा व्यक्ति को जल्दी आकर्षित करती है और वह उन बातों को लेकर चिंतित हो जाता है, जिनका कोई वास्तविक आधार नहीं होता। वह भविष्य की चिंता और अतीत की स्मृतियों में उलझकर अपना वर्तमान खो देता है, जबकि सच्चाई यह है कि मनुष्य के नियंत्रण में केवल वर्तमान ही होता है।यह कहा गया है कि साम्राज्य तलवारों से नहीं, शंकाओं से टूटे हैं। जब मन में शंका प्रवेश कर जाती है, तो सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी कमजोर पड़ जाता है। किसी भी बाहरी युद्ध को जीतने से पहले उसे मन में जीतना आवश्यक होता है। इसलिए मन में संदेह, भय और नकारात्मकता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।मनुष्य को यह समझना चाहिए कि भविष्य में क्या होगा या क्या नहीं होगा, इसकी चिंता करना व्यर्थ है। हमारे कर्म ही हमें विस्तार देते हैं। जो हमारे हाथ में है, वह वर्तमान है। इसलिए आवश्यक है कि हम भविष्य की चिंता छोड़कर वर्तमान में पूरे होश-हवास के साथ अपने कर्म करें। जब हम वर्तमान में ईमानदारी और समर्पण से कार्य करते हैं, तो भविष्य का अंधकार स्वतः छँटने लगता है।सरल शब्दों में कहें तो इंसान वास्तविक समस्याओं से तो समझौता कर लेता है, लेकिन आने वाली संभावित परेशानियों की चिंता उसे भीतर से तोड़ देती है। डर सबसे पहले मन को हराता है और जब मन हार जाता है, तो बाहरी जीत भी असंभव हो जाती है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े पतन बाहरी शत्रुओं से नहीं, बल्कि अंदर के भय से हुए हैं। महान वही होता है, जो डर के बावजूद आगे बढ़े। जो व्यक्ति केवल सामने की वास्तविकता पर ध्यान देता है और अपने कर्म करता है, वही अपने भविष्य को सही दिशा दे पाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम अनदेखी आशंकाओं से डरने के बजाय उन्हें समझें और विवेक से उनका सामना करें।जब इंसान अपने मन के भय से मुक्त हो जाता है, तभी वह वास्तव में स्वतंत्र होता है और यही सच्ची जीत है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 05 फरवरी 26