लेख
05-Feb-2026
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भारतीय फिल्म उद्योग जिसे आमतौर पर ग्लैमर सफलता और सपनों की दुनिया के रूप में देखा जाता रहा है आज एक गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। हाल के वर्षों में लगातार सामने आ रही फायरिंग की घटनाएं धमकियां दुष्कर्म के आरोप और आपराधिक गिरोहों की दखलअंदाजी ने न केवल फिल्म इंडस्ट्री की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि सभ्य समाज की सोच को भी झकझोर कर रख दिया है। यह केवल कुछ व्यक्तियों का मामला नहीं रह गया है बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक चिंता का विषय बन चुका है। मुंबई जैसे महानगर में जहां देश की आर्थिक और सांस्कृतिक धड़कन बसती है वहां खुलेआम फायरिंग की घटनाएं होना अपने आप में गंभीर संकेत है। ओशिवारा फायरिंग मामला हो या रोहित शेट्टी के घर के बाहर हुई गोलियां यह घटनाएं यह बताती हैं कि अपराध का भय अब आम नागरिकों तक सीमित नहीं रहा बल्कि वह उन लोगों तक भी पहुंच गया है जिन्हें समाज प्रभावशाली और सुरक्षित मानता था। जब हीरो निर्देशक और निर्माता खुद असुरक्षित महसूस करने लगें तो आम जनता के मन में भय का स्तर स्वतः बढ़ जाता है। कमाल आर खान जैसे विवादित लेकिन चर्चित व्यक्ति का नाम फायरिंग मामले में आना और फिर जमानत मिलना कानून व्यवस्था और जांच प्रक्रिया पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। सभ्य समाज यह सोचने को मजबूर होता है कि क्या कानून सभी के लिए समान है। क्या प्रभाव और प्रसिद्धि जांच की दिशा को प्रभावित करती है। जब लाइसेंसी हथियारों से फायरिंग की बात सामने आती है तो यह चिंता और गहरी हो जाती है क्योंकि लाइसेंस सुरक्षा के लिए दिया जाता है भय फैलाने के लिए नहीं। दूसरी ओर संगठित अपराध और गैंग कल्चर का फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश एक खतरनाक संकेत है। लॉरेंस बिश्नोई गैंग द्वारा खुलेआम जिम्मेदारी लेना और सोशल मीडिया पर धमकियां देना यह दर्शाता है कि अपराधी अब कानून से नहीं डरते। जब धमकी में यह कहा जाए कि अगली गोली छाती पर लगेगी तो यह केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज को डराने का प्रयास होता है। सभ्य समाज ऐसी घटनाओं को केवल सनसनी के रूप में नहीं देखता बल्कि इसे सामाजिक विघटन के संकेत के रूप में देखता है। फिल्म इंडस्ट्री हमेशा से समाज का आईना मानी जाती रही है। परंतु आज जब उसी इंडस्ट्री के सितारों पर दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप लगते हैं तो यह आईना धुंधला हो जाता है। सभ्य समाज के लिए यह स्वीकार करना कठिन हो जाता है कि जिन चेहरों को वह आदर्श मानता रहा है वे नैतिक रूप से गिर सकते हैं। ऐसे आरोप केवल एक व्यक्ति की छवि को नहीं तोड़ते बल्कि लाखों प्रशंसकों की आस्था को भी चोट पहुंचाते हैं। दुष्कर्म के मामलों में सबसे बड़ी चिंता यह है कि पीड़िता को न्याय मिलेगा या नहीं। जब आरोपी एक बड़ा सितारा होता है तब समाज यह देखता है कि क्या सत्ता पैसा और प्रसिद्धि न्याय को दबा देंगे। यही कारण है कि ऐसे मामलों में जन आक्रोश अधिक होता है। सभ्य समाज चाहता है कि कानून बिना डर और दबाव के अपना काम करे। चाहे आरोपी कितना भी बड़ा नाम क्यों न हो। सलमान खान जैसे सुपरस्टार को धमकियां मिलना यह बताता है कि अपराधी मानसिकता अब खुलकर चुनौती दे रही है। यह केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का मुद्दा नहीं है बल्कि यह राज्य की कानून व्यवस्था की परीक्षा है। जब एक अभिनेता को बार बार सुरक्षा घेरा बढ़ाना पड़े तो समाज यह सोचता है कि क्या आम आदमी सुरक्षित है। यह डर धीरे धीरे सामूहिक चिंता में बदल जाता है। इन घटनाओं का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी गहरा है। युवा वर्ग जो फिल्मी सितारों को अपना आदर्श मानता है वह भ्रमित हो जाता है। एक ओर वही सितारे पर्दे पर न्याय और नैतिकता की बात करते हैं और दूसरी ओर वास्तविक जीवन में उन पर अपराध के आरोप लगते हैं। यह विरोधाभास युवाओं के नैतिक विकास को प्रभावित करता है। सभ्य समाज के लिए यह चिंता का विषय है कि आने वाली पीढ़ी किन मूल्यों से प्रेरित होगी। मीडिया की भूमिका भी इस पूरे परिदृश्य में महत्वपूर्ण है। कई बार सनसनीखेज रिपोर्टिंग मुद्दे की गंभीरता को कम कर देती है। फायरिंग और धमकियों को मनोरंजन की खबर की तरह पेश किया जाता है। इससे समाज में अपराध के प्रति संवेदनशीलता घटने का खतरा रहता है। सभ्य समाज चाहता है कि मीडिया जिम्मेदारी से रिपोर्ट करे ताकि सच सामने आए और न्याय की प्रक्रिया मजबूत हो। फिल्म इंडस्ट्री पर बढ़ते विवाद यह भी दिखाते हैं कि आंतरिक अनुशासन और पारदर्शिता की कमी है। यदि समय रहते आत्ममंथन नहीं किया गया तो यह संकट और गहराएगा। सभ्य समाज यह उम्मीद करता है कि इंडस्ट्री अपने भीतर सुधार करे और अपराध या अनैतिक आचरण के प्रति शून्य सहनशीलता अपनाए। आज स्थिति यह है कि फायरिंग धमकी और दुष्कर्म जैसे शब्द अब खबरों में आम हो गए हैं। यह सामान्यीकरण सबसे खतरनाक पहलू है। जब समाज किसी भी तरह के अपराध को सामान्य मानने लगे तो संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है। सभ्य समाज इस प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं कर सकता। वह चाहता है कि हर अपराध पर उतनी ही गंभीर प्रतिक्रिया हो जितनी पहली बार होती है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बॉलीवुड में बढ़ते विवाद केवल फिल्म इंडस्ट्री की समस्या नहीं हैं बल्कि यह पूरे समाज का प्रतिबिंब हैं। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हमने सफलता प्रसिद्धि और शक्ति को किस तरह परिभाषित किया है। सभ्य समाज का दायित्व है कि वह सवाल पूछे और जवाब मांगे। केवल तभी यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि कला संस्कृति और कानून एक स्वस्थ दिशा में आगे बढ़ें। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 5 फरवरी /2026