लेख
05-Feb-2026
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मेन्स्ट्रुअल साइकल मासिक धर्म पीरियड्स।किशोर वय में कदम रखते ही बच्चियों महिलाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा है। लेकिन इसके बावजूद इस बारे में खुलकर बातचीत करना वर्जना भरा माना जाता रहा है। आम भारतीय समाज में आज भी महिलाओं को होने वाली मासिकधर्म के बारे में न तो बात होती है और न ही इसके बारे में सोचा जाता है। शायद यही कारण है कि आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि मेन्स्ट्रुअल हेल्थ महिलाओं का मौलिक अधिकार है और हर स्कूल को फ्री सैनेटरी पैड की व्यवस्था करनी होगी। हाल ही में यह फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका पर आया है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि पीरियड आने पर लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके परिवारों के पास पैड पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं होते। इस पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेन्स्ट्रुअल हेल्थ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। अदालत ने आदेश दिया कि सभी स्कूलों को 6वीं से 12वीं तक पढ़ने वालीं छात्राओं के लिए फ्री सैनेटरी पैड की व्यवस्था करनी होगी। कोर्ट ने सख्त लहजे में ये भी कहा कि अगर इसका पालन नहीं होता है तो स्कूल की मान्यता रद्द की जा सकती है। आपको बता दें कि भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो केवल कानून की व्याख्या नहीं करते, बल्कि समाज की चेतना को नई दिशा देते हैं। देश के सभी सरकारी व प्राइवेट स्कूलों में लड़कियों के लिए मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना, लड़‌कियों लड़कों के लिए अलग वॉशरूम बनाना और डिसेबल-फ्रेंडली टॉयलेट की व्यवस्था अनिवार्य करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसले दिए है, ये फैसले इसी श्रेणी में आते हैं। शीर्ष न्यायलय ने देशभर के सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा 6 से 12वीं तक की छात्राओं के लिए अलग शौचालय, मुफ्त सैनिटरी पैड और मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर की अनिवार्यता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मासिक धर्म अब किसी हाशिए पर धकेले जाने वाला विषय नहीं, बल्कि अधिकार, स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़ा सवाल है। अगर यह निर्णय सिर्फ सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का आदेश नहीं है, बल्कि यह लड़कियों के स्वास्थ्य, गरिमा, शिक्षा और समानता के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण देने की ऐतिहासिक पहल है। मासिक धर्म को समाज में एक निजी, लगभग अदृश्य विषय मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा है। स्कूलों में इसकी अनदेखी का सबसे बड़ा खामियाजा लड़‌कियों को भुगतना पड़ता है। सुविधाओं के अभाव में लाखों छात्राएं हर महीने कई दिन स्कूल नहीं जा पार्टी और धीरे-धीरे पढ़ाई से पूरी तरह दूर हो हो जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ने इस मौन पीड़ा को संविधान के दायरे में लाकर स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों का प्रश्न है। अदालत का यह कहना कि मासिक धर्म स्वच्छता अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है, भारतीय न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण विस्तार है। जीवन का अधिकार अब केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन की परिस्थितियों को भी समाहित करता है। जब एक छात्रा केवल इसलिए असहज, असुरक्षित और अपमानित महसूस करती है, क्योंकि उसके लिए बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो यह सीधे-सीधे उसके जीवन के अधिकार का हनन है। इस फैसले को एक और बड़ी विशेषता इसका शिक्षा के अधिकार से जुड़ना है। अनुच्छेद 21 के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा तभी सार्थक है जब स्कूल का वातावरण सुरक्षित, समावेशी और संवेदनशील हो। यदि मासिक धर्म के दिनों में छात्राएं स्कूल आने से मजबूरन वंचित हो जाती हैं, तो शिक्षा का अधिकार खोखला साबित होता है। अदालत ने इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए शिक्षा को केवल किताबों और पाठ्यक्रम तक सीमित न मानकर, स्वास्थ्य और गरिमा से जोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी सरकारी, सहायता प्राप्स और निजी स्कूलों में मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का निर्देश व्यावहारिक और दूरगामी है। यह फैसला यह भी सुनिश्चित करता है कि यह सुविधा किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित न रहे। शहरी और ग्रामीण, सरकारी और निजी हर स्कूल इस दायित्व से बंधा होगा। इससे समानता के सिद्धांत को वास्तविक अथों में लागू करने की दिशा में कदम बढ़ता है। शौचालय सुविधाओं पर अदालत का जोर भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वच्छ, कार्यशील, जैडर सेग्रिगेटेड और पानी से जुड़े शौचालय केवल बुनियादी ढांचा नहीं, बल्कि गरिमा की शर्त हैं। दिव्यांग छात्राओं के लिए अनुकूल सुविधाओं की अनिवार्यता यह दर्शाती है कि न्यायालय ने समावेशन को केंद्र में रखा है। हँडबॉश के लिए साबुन और पानी जैसी साधारण दिखने वाली चीजें भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। जागरूकता और प्रशिक्षण पर दिया गया जोर इस निर्णय को केवल भौतिक सुविधाओं तक सीमित नहीं रहने रहने देता। जब तक छात्राएं, शिक्षक और स्कूल स्टाफ मासिक धर्म को वैज्ञानिक और स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में नहीं समझेंगे, तब तक सुविधाएं भी पूरी तरह कारगर नहीं होंगी। यह फैसला सामाजिक चुप्पी को तोड़ने का आह्वान करता है, जहां शिक्षक मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधनों और संवाद की कमी से बंधे रहते हैं। अदालत द्वारा अनुपालन न करने पर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द करने और सरकारी स्कूलों के लिए राज्य सरकारों की जवाबदेही तय करना, इस आदेश को मजबूती देता है। अक्सर कल्याणकारी निर्देश कागजों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन यहां सख्ती यह संदेश देती है कि यह दया या अनुग्रह का विषय नहीं, बल्कि अधिकार का प्रश्न है। सबसे मार्मिक पहलू अदालत की वह टिप्पणी है, जिसमें उसने सीधे उन लड़‌कियों से संवाद किया जो मासिक धर्म के कारण स्कूल से दूर रहीं और जिन्हें अशुद्ध कहकर शिक्षा से वंचित किया गया। यह कहना कि यह तुम्हारी गलती नहीं है, न्यायिक भाषा से आगे बढ़कर मानवीय संवेदना का उदाहरण है। यह संदेश केवल छात्राओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है। यह फैसला ड्रॉपआउट दर कम करने, लैंगिक समानता बढ़ाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। तीन महीने के भीतर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से रिपोर्ट मांगना और केंद्र सरकार को राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश देना इस फैसले की गंभीरता को दर्शाता है। अक्सर नीतियां कागों तक सीमित रह जाती हैं, लेकिन जवाबदेही तय करने और समय-सीमा निर्धारित करने से यह उम्मीद बढ़ती है कि यह आदेश वास्तविक बदलाव में बदलेगा। मान्यता रद्द करने की चेतावनी यह भी संकेत देती है कि अब लापरवाही को बर्दास्त नहीं किया जाएगा, चाहे वह सरकारी स्कूल हो या निजी। इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू है कि दिव्यांग-अनुकूल शौचालयों की अनिवार्यता, समावेशी शिक्षा की बात अक्सर की जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुविधाओं की कमी विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। यह निर्देश यह याद दिलाता है कि समानता का अर्थ केवल बहुसंख्यक की जरूरतें पूरी करना नहीं, बल्कि सबसे कमजोर और उपेक्षित वर्ग को केंद्र में रखना है। यह फैसला शिक्षकों और अभिभावकों के लिए भी एक आईना है। शिक्षक जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में असहाय महसूस करते हैं, अब उन्हें एक संस्थागत समर्थन मिलेगा। वहीं अभिभावकों के लिए यह एक संदेश है कि मासिक धर्म कोई निजी या छुपाने वाली समस्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ा सार्वजनिक मुद्दा है। जब अदालत यह कहती है कि समाज की प्रगति का पैमाना उसके सबसे कमजोर वर्ग के प्रति व्यवहार से तय होता है, तो यह केवल एक नैतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी का आह्वान है। हालांकि, चुनौतियां कम नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे की कमी, फंडिंग, रखरखाव और जागरूकता ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जो इस फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन सकते हैं। केवल शौचालय बना देना या पैड उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा; उनकी नियमित आपूर्ति, स्वच्छता और उपयोग को लेकर शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है। इसके लिए राज्य सरकारों, स्कूल प्रशासन, शिक्षकों, स्थानीय समुदाय और स्वयंसेवी संगठनों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। इन सबके बीच देखा जाए तो यह आदेश सिर्फ सैनेटरी पैड बांटने या टॉयलेट बनाने तक सीमित नहीं है; यह मानवाधिकार, शिक्षा के अधिकार, स्वास्थ्य सुरक्षा और लैंगिक समानता के मूल सिद्धांत का संरक्षण है। इस फैसले से उम्मीद है कि लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मसम्मान में सकारात्मक बदलाव आएगा और हमारा समाज पहले से अधिक समावेशी और संवेदनशील बनेगा। बेहतर होगा निकट भविष्य में अदालत महिलाओं खासकर अवयस्क बच्चियों के साथ होने वाले अपराधों के लिए भी मौजूदा कानून के परिपालन में पुलिस को अधिक संवेदनशील बनाए ताकि बच्चियों को स्वतंत्र निर्भय जीवन जीने का अधिक अवसर मिल सके। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 05 फरवरी 26