इन्दौर (ईएमएस) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने श्रम कानून से संबंधित एक अपील याचिका पर सुनवाई उपरांत इंडस्ट्रीयल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते याचिका को खारिज कर दिया। इंडस्ट्रीयल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली यह अपील याचिका हाईकोर्ट में मेडिकैप्स लिमिटेड द्वारा दायर की गई थी। याचिका में मेडीकैप्स ने इंदौर की इंडस्ट्रियल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मजदूरों की देरी माफ कर मामले को दोबारा लेबर कोर्ट भेजा गया था। याचिका कहानी संक्षेप में इस प्रकार हैं कि 22 नवंबर 2019 को मेडिकैप्स लिमिटेड के औद्योगिक प्रतिष्ठान के बंद होने के मामले में प्रबंधन का कहना था कि प्रतिष्ठान को बंद इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 और मध्यप्रदेश इंडस्ट्रियल रिलेशन्स एक्ट, 1960 (एमपीआईआर एक्ट) के तहत तय प्रक्रिया का पालन कर किया गया और सभी कर्मचारियों को उनके वैधानिक बकाए का भुगतान कर दिया गया है। जबकि एमपीआईआर एक्ट के तहत इस बंद को मजदूरों ने चुनौती दी थी। जिसे पहले लेबर कोर्ट और फिर इंडस्ट्रियल कोर्ट ने बंद को वैध ठहराया। इसके बाद मजदूरों ने फिर से लेबर कोर्ट में एक नया आवेदन दायर कर कहा कि कि 22 नवंबर 2019 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थी इसके तुरंत बाद देशव्यापी लॉकडाउन लग गया और अशिक्षा व कानूनी जानकारी के अभाव में वे तय समय-सीमा में कानूनी उपाय नहीं कर पाए। लेबर कोर्ट ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि यह एमपीआईआर एक्ट की धारा 62 के तहत एक साल की लिमिटेशन से बाधित है। मजदूरों ने इसके खिलाफ इंडस्ट्रियल कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कोविड काल के दौरान लिमिटेशन बढ़ाने वाले निर्देशों (फरवरी 2022 तक) का हवाला देते हुए देरी को माफ कर दिया और मामले को योग्यता (मेरिट्स) के आधार पर फैसले के लिए लेबर कोर्ट को वापस भेज दिया। इंडस्ट्रियल कोर्ट के रिमांड आदेश को चुनौती देते हुए नियोक्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि कोविड अवधि हटाने के बाद भी करीब 15 महीने की बिना स्पष्टीकरण की देरी बनी रहती है और बंद का मुद्दा पहले ही अंतिम रुप ले चुका है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंदर सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य (2025 एससीसी ऑनलाइन एससी 600) फैसले का हवाला देते कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि इंडस्ट्रियल कोर्ट ने सही उदार रुख अपनाया है। मजदूरों ने स्पष्ट रूप से अशिक्षा और कानूनी प्रावधानों की जानकारी न होने की बात कही थी और देरी का बड़ा हिस्सा महामारी काल से जुड़ा था। कोर्ट ने दोहराया कि श्रम कानून फायदेमंद होते हैं और ऐसे मामलों में अत्यधिक तकनीकी रवैया अपनाने से बचना चाहिए।