क्षेत्रीय
05-Feb-2026
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हाईकोर्ट ने एफआईआर और उसके आधार पर चल रही आपराधिक कार्रवाई निरस्त की जबलपुर (ईएमएस)। म.प्र.उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बीपी शर्मा की एकलपीठ ने फोन पर कथित गाली-गलौज और धमकी देने के आरोपों से जुड़े एक पुराने मामले में सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि महज फोन कॉल पर अश्लील भाषा का प्रयोग आईपीसी की धारा 294 के दायरे में नहीं आता, यह अपराध सार्वजनिक स्थान पर होना जरूरी है। इसी आधार पर न्यायालय ने प्रकरण में दर्ज एफआईआर और उससे उत्पन्न सभी कार्यवाहियां निरस्त कर दीं। राजस्थान के करौली में रहने वाले दीपक भटनागर व अन्य की ओर से दायर याचिका में मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के कोतवाली थाने में 18 जुलाई 2011 को याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता दीपक के ससुर रामगोपाल भटनागर (छतरपुर) ने आरोप लगाया था कि दीपक सहित सभी याचिकाकर्ताओं ने फ़ोन पर कॉल करके उन्हें गालियां देकर जान से मारने की धमकी दी। पुलिस ने जांच के बाद आईपीसी की धारा 294 और 506-बी/34 के तहत एपफआईआर दर्ज की थी, जिसके बाद मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष विचाराधीन था। मामले में सुनवाई दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट पुनीत श्रोती ने दलील दी कि एफआईआर में लगाए गए आरोप धारा 294 आईपीसी के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करते। फोन कॉल पर कही गई अश्लील भाषा को सार्वजनिक स्थान पर किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता। जब धारा 294 लागू ही नहीं होती, तो धारा 506 आईपीसी (गैर-संज्ञेय अपराध) में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती। इस संबंध में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट तथा केरल हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी हवाला दिया गया। उच्च न्यायालय ने एफआईआर और रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि शिकायत में वर्णित पूरा घटनाक्रम केवल मोबाइल फोन पर हुई बातचीत तक सीमित है। धारा 294 आईपीसी के लिए अपराध का सार्वजनिक स्थान पर होना अनिवार्य है। जब धारा 294 लागू नहीं होती, तो धारा 506 आईपीसी में भी एफआईआर दर्ज करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। इस मत के साथ अदालत ने कोतवाली थाने में दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर की जा रहीं सभी कार्रवाई को निरस्त करके याचिकाकर्ताओं को बरी कर दिया। अजय पाठक / मोनिका / 05 फरवरी 2026