राज्य
05-Feb-2026
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- जनसुनवाई से थानों तक भटक रहीं पीडि़त महिलाएं लगभग 45 प्रतिशत प्रताडऩा के मामले बढ़े, समझाइश के बाद भी बिखर रहे परिवार भोपाल (ईएमएस)। जनसुनवाई में महिलाएं पति द्वारा दूसरी शादी, दहेज की मांग और मानसिक-शारीरिक प्रताडऩा की शिकायतें लेकर पहुंच रही हैं, लेकिन न्याय की उम्मीद लेकर आईं पीडि़ताओं को राहत के बजाय सिर्फ फाइलों की यात्रा कराई जा रही है। एक ओर महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा गठित दहेज प्रतिषेध बोर्ड पिछले तीन वर्षों से पूरी तरह निष्क्रिय पड़ा है, वहीं दूसरी ओर दहेज प्रताडऩा के मामले लगातार डराने वाली रफ्तार से बढ़ रहे हैं। दहेज के बढ़ते मामलों और शिकायतों पर लगाई जा रहे सवालिया निशान और गंभीरता पर संज्ञान लेने के लिए केंद्र सरकार ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत हर जिले में बोर्ड का गठन तो किया गया लेकिन इस पर कोई प्रकरण समझाइए इसके लिए या जांच के लिए नहीं पहुंच सका है 3 साल से गठन के बावजूद भी बोर्ड बस्तों में बंद है। महिला थाना से प्राप्त आंकड़े हालात की गंभीरता को उजागर करते हैं। जनसुनवाई में सुनवाई, लेकिन कार्रवाई शून्य जनसुनवाई में आने वाले अधिकांश महिला प्रकरणों में अधिकारियों द्वारा शिकायतें संबंधित विभाग को भेज दी जाती हैं। इसके बाद ये मामले फैमिली काउंसलिंग या मध्यस्थता केंद्रों तक सीमित रह जाते हैं, जहां गंभीर अपराधों में भी समझौते का दबाव बनाया जाता है। पीडि़त महिलाओं का आरोप है कि दूसरी शादी और दहेज जैसे अपराधों में भी कानून के बजाय घर बचाने की सलाह देकर मामले रफा-दफा कर दिए जाते हैं। 3 साल से निष्क्रिय दहेज प्रतिषेध बोर्ड दहेज प्रतिषेध बोर्ड का गठन त्वरित राहत, निगरानी और बहु-विभागीय कार्रवाई के लिए किया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि तीन वर्षों में न बोर्ड की बैठक हुई, न नियम तय हुए, न कार्यप्रणाली बनी और न ही एक भी शिकायत औपचारिक रूप से बोर्ड तक पहुंची। बढ़ते अपराधों के बीच बोर्ड के निष्क्रिय रहने से प्रशासन के पास फिलहाल केवल दो ही विकल्प बचे हैं। गंभीर मामलों में पीडि़ताओं को सीधे पुलिस कार्रवाई का रास्ता अपनाना पड़ता है। दहेज उत्पीडऩ जैसे अपराधों में समझौता प्रक्रिया कई बार पीडि़ता के लिए और अधिक पीड़ादायक साबित होती है। विनोद/ 5 फरवरी /2026