सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे समाज के लिए चेतावनी की तरह है कि बच्चों को बिना जिम्मेदारी सिखाए सुविधाओं की चाबी सौंप देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है ।पुणे के चर्चित नाबालिग कार चालक दुर्घटना मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने जो कहा वह हमारे सामाजिक ढांचे पर सीधा सवाल खड़ा करता है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब माता पिता अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते जब वे संवाद नहीं कर पाते तब वे पैसे और सुविधाओं से उस कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं। और यही प्रवृत्ति आगे चलकर गंभीर सामाजिक समस्या बन जाती है। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि नाबालिगों को कार की चाबियां देना महंगे शौक पूरे करने के लिए बेहिसाब पैसा देना और उनकी गतिविधियों पर नियंत्रण न रखना केवल व्यक्तिगत चूक नहीं है बल्कि यह सामूहिक लापरवाही का प्रतीक है ।आज के शहरी समाज में यह पैटर्न बार बार सामने आ रहा है। जहां कम उम्र के बच्चे देर रात पार्टियों में शामिल होते हैं ,शराब और नशे के संपर्क में आते हैं। तेज रफ्तार से वाहन चलाते हैं। और निर्दोष लोगों की जान खतरे में डाल देते हैं। इसके बाद जब दुर्घटना होती है तो प्रभाव और पैसे के बल पर सबूतों से छेड़छाड़ की कोशिश की जाती है। मेडिकल साक्ष्य बदले जाते हैं। और कानून के शिकंजे से बचने के रास्ते तलाशे जाते हैं। पुणे का यह मामला इसलिए भी झकझोरने वाला है क्योंकि इसमें दो युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की जान चली गई जो अपने भविष्य के सपने संजोए हुए थे। एक पल की लापरवाही ने उनके परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। अदालत ने जिन तीन आरोपियों की जमानत अर्जी पर सुनवाई की वे सबूत मिटाने और रक्त के नमूने बदलने जैसे गंभीर आरोपों में घिरे थे ।यह दर्शाता है कि समस्या केवल नाबालिग की नहीं बल्कि पूरे तंत्र की है जहां अपराध के बाद भी सच को दबाने की कोशिश होती है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सबसे अहम पहलू यह है कि उसने जिम्मेदारी का केंद्र माता पिता को माना है ।न्यायालय ने कहा कि माता पिता के पास बच्चों से बात करने का समय नहीं होता यही मूल समस्या है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा की दौड़ में माता पिता यह भूल जाते हैं कि बच्चों के साथ समय बिताना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है ।जब संवाद टूटता है तो बच्चे मोबाइल फोन क्रेडिट कार्ड और महंगी गाड़ियों के सहारे अपनी मर्जी की दुनिया बना लेते हैं ।उन्हें यह नहीं सिखाया जाता कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। आज भारत में नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने से होने वाली दुर्घटनाओं के आंकड़े डराने वाले हैं ।वर्ष 2023 24 में ऐसे लगभग बारह हजार हादसे दर्ज किए गए जिनमें हजारों लोगों की जान गई। यह केवल संख्या नहीं है बल्कि हजारों परिवारों का दर्द है। हर दुर्घटना के पीछे एक कहानी है किसी मां की सूनी गोद किसी पिता का टूटा सहारा और किसी बच्चे का अधूरा बचपन यह आंकड़े बताते हैं कि कानून के साथ साथ सामाजिक चेतना की भी सख्त जरूरत है। कानून पहले से मौजूद है मोटर वाहन अधिनियम नाबालिगों के वाहन चलाने पर सख्त प्रतिबंध लगाता है और हाल के वर्षों में अभिभावकों पर भी जुर्माने और सजा का प्रावधान किया गया है लेकिन कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक समाज उसे स्वीकार न करे। जब तक माता पिता यह न समझें कि प्यार का मतलब हर मांग पूरी करना नहीं है बल्कि सही और गलत के बीच फर्क सिखाना है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से इसे गंभीर सामाजिक समस्या बताया है,वह हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है क्या हम बच्चों को केवल सुविधाएं दे रहे हैं या संस्कार भी क्या हम उन्हें यह सिखा रहे हैं कि सड़क पर चल रही हर गाड़ी के सामने एक इंसान की जिंदगी होती है क्या? हम उन्हें यह समझा पा रहे हैं कि कानून से बचना चतुराई नहीं बल्कि कायरता है। आज जरूरत इस बात की है कि परिवार स्कूल और समाज मिलकर बच्चों के लिए एक जिम्मेदार वातावरण तैयार करें माता पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ समय बिताएं उनकी बात सुनें उनकी जिज्ञासाओं को समझें और सीमाएं तय करें ।बच्चों को स्वतंत्रता मिले लेकिन उम्र और समझ के अनुसार मिले। स्कूलों में सड़क सुरक्षा और नागरिक जिम्मेदारी को केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बल्कि व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए। समाज को भी ऐसे मामलों में चुप्पी तोड़नी होगी प्रभाव और पैसे के दबाव में गलत को सही ठहराने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। मीडिया और सोशल मीडिया की भी भूमिका अहम है जहां एक ओर तेज रफ्तार और लग्जरी लाइफस्टाइल का महिमामंडन होता है वहीं दूसरी ओर उसके दुष्परिणामों को उतनी गंभीरता से नहीं दिखाया जाता। युवाओं को यह संदेश दिया जाना चाहिए कि असली स्टाइल जिम्मेदारी में है न कि नियम तोड़ने में। सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश स्पष्ट है कि अब नरमी का दौर खत्म होना चाहिए कानून को उन लोगों पर शिकंजा कसना होगा जो अपने बच्चों की गलतियों को ढाल बनकर ढकते हैं। लेकिन उससे भी पहले समाज को यह समझना होगा कि भविष्य की सुरक्षा आज की जिम्मेदारी से जुड़ी है यदि आज हम बच्चों को ऐश की चाबियां थमा देंगे तो कल वे उन चाबियों से न केवल अपनी बल्कि दूसरों की जिंदगी भी खतरे में डाल सकते हैं। अंत में यही कहा जा सकता है। कि यह मामला एक चेतावनी है। एक अवसर है खुद को सुधारने का माता पिता के लिए यह समय है रुककर सोचने का कि वे अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं। केवल पैसा और सुविधाएं या समय संस्कार और जिम्मेदारी यदि हम इस सवाल का ईमानदारी से जवाब ढूंढ लें तो शायद सड़कों पर मासूम जिंदगियां बच सकें। और समाज एक सुरक्षित दिशा में आगे बढ़ सके। (L103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार,सहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 06 फरवरी 26