राष्ट्रीय
06-Feb-2026
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-सत्ता-विपक्ष में टकराव: क्या संसद में संवाद और सहमति की वह परंपरा फिर लौट पाएगी? नई दिल्ली,(ईएमएस)। संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव नई बात नहीं है, लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में यह टकराव एक दशक से ज्यादा समय से तीखा बना हुआ है। बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के फैसलों पर विपक्ष, सवाल उठाता है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस भूमिका में सबसे आगे नजर आते हैं। सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है, लेकिन कई बार ये सवाल ऐसे मुद्दों पर केंद्रित होते हैं, जो बाद में भ्रामक या प्रक्रियागत कारणों से निरस्त कर दिए जाते हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ताजा विवाद पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक के हवाले से भारत–चीन सीमा विवाद से जुड़ा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने इस पुस्तक का उल्लेख करते हुए डोकलाम/गलवान क्षेत्र में चीनी टैंकों के भारतीय सीमा में प्रवेश का दावा किया। सरकार ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अप्रकाशित और स्वीकृत पुस्तक के तथ्यों का संसद में हवाला देना नियमों के खिलाफ है। लोकसभा अध्यक्ष ने नियम का हवाला देते हुए राहुल गांधी को रोक दिया और उनके बयान के कुछ अंश कार्यवाही से हटा दिए। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक आरोप–प्रत्यारोप तेज हो गए। बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी बार-बार ऐसे मुद्दे उठाते हैं, जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थानों की छवि पर सवाल खड़े होते हैं। वहीं कांग्रेस का कहना है कि सरकार असहज सवालों से बचने के लिए नियमों की आड़ ले रही है। राहुल गांधी और पीएम मोदी के बीच राजनीतिक टकराव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। राहुल गांधी अक्सर बड़े उद्योगपतियों से सरकार की निकटता, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और विदेश नीति पर सवाल उठाते हैं। इस सियासी तनातनी के बीच 1994 का एक प्रसंग है। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के नेता थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की जिनेवा बैठक में भारत का पक्ष रखने के लिए नरसिंह राव ने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधि नामित किया था। कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के आरोपों का वाजपेयी ने वहां मजबूती से जवाब दिया था। इसे भारतीय संसदीय राजनीति में परिपक्वता और सहमति की एक मिसाल माना जाता है। आज के राजनीतिक माहौल में उस दौर की तुलना बार-बार की जाती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती खाई के बीच यह सवाल भी उठता है कि क्या संसद में संवाद और सहमति की वह परंपरा फिर लौट पाएगी या टकराव ही लोकतांत्रिक विमर्श का स्थायी स्वर बनता जाएगा। सिराज/ईएमएस 06 फरवरी 2026