(9 फरवरी जानकी जयंती) जानकी जयंती, जिसे सीता अष्टमी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में विशेष श्रद्धा और भाव से मनाई जाती है। यह पर्व केवल एक तिथि या धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन को भीतर से परिष्कृत करने का अवसर प्रदान करता है। माता सीता को त्याग, सहनशीलता, मर्यादा और नारी शक्ति का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। ऐसे में उनके नाम से जुड़ा यह व्रत व्रतधारियों के लिए मानसिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक स्तर पर गहरे लाभ देने वाला माना जाता है। शास्त्रीय मान्यताओं और लोक-आस्था में यह विश्वास गहराई से जुड़ा है कि सच्चे मन से किया गया जानकी जयंती का व्रत जीवन की अनेक उलझनों को सुलझाने में सहायक होता है। जानकी जयंती का व्रत मुख्य रूप से वैवाहिक सुख, पारिवारिक शांति और अखंड सौभाग्य से जुड़ा हुआ माना जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत पति की दीर्घायु, दांपत्य जीवन में मधुरता और आपसी समझ को मजबूत करने वाला कहा गया है। माता सीता का संपूर्ण जीवन त्याग और समर्पण का उदाहरण है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर जब कोई महिला इस व्रत को करती है, तो उसके भीतर धैर्य और सहनशीलता का विकास होता है। यही गुण किसी भी वैवाहिक रिश्ते को स्थायी और मजबूत बनाते हैं। माना जाता है कि जानकी जयंती के दिन की गई पूजा और व्रत से घर के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे पारिवारिक कलह, मनमुटाव और तनाव धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। यह व्रत केवल विवाहित महिलाओं तक सीमित नहीं है। कुंवारी कन्याओं के लिए भी जानकी जयंती का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और माता सीता की श्रद्धापूर्वक आराधना करने से योग्य, संस्कारी और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होने की कामना पूर्ण होती है। माता सीता को आदर्श पत्नी और आदर्श नारी के रूप में देखा जाता है, इसलिए उनकी उपासना से विवाह से जुड़ी बाधाएं दूर होने का विश्वास किया जाता है। कई परिवारों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है कि विवाह योग्य कन्याएं जानकी जयंती का व्रत रखती हैं और माता से अपने भविष्य के लिए सद्बुद्धि और सही निर्णय की प्रार्थना करती हैं। जानकी जयंती के व्रत का एक बड़ा लाभ मानसिक शांति से भी जुड़ा हुआ है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब जिम्मेदारियां, अपेक्षाएं और रिश्तों की जटिलताएं मन को बोझिल बना देती हैं, तब ऐसे व्रत और पर्व व्यक्ति को ठहरकर स्वयं से जुड़ने का अवसर देते हैं। माता सीता का जीवन यह सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी संयम और मर्यादा कैसे बनाए रखी जाए। व्रतधारी जब इस भाव के साथ पूजा करता है, तो उसके भीतर आत्मबल और स्थिरता का विकास होता है। यह मानसिक मजबूती धीरे-धीरे जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगती है। धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो जानकी जयंती का व्रत ग्रह दोषों और नकारात्मक प्रभावों को शांत करने वाला भी माना जाता ,है। विशेष रूप से वैवाहिक जीवन में बार-बार आने वाली परेशानियों, अनबन या विलंब से जुड़े योगों के लिए इस व्रत को लाभकारी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन बनने वाले ग्रह योग और तिथिगत संयोग पूजा के प्रभाव को और अधिक बढ़ा देते हैं। माता सीता और भगवान राम की संयुक्त पूजा से जीवन में संतुलन आता है, क्योंकि यह पूजा स्त्री और पुरुष ऊर्जा के सामंजस्य का प्रतीक मानी जाती है। जानकी जयंती के दिन किए जाने वाले दान और सुहाग सामग्री अर्पण का भी विशेष महत्व है। सुहागिन महिलाओं द्वारा चूड़ी, बिंदी, सिंदूर और अन्य श्रृंगार सामग्री का दान करना न केवल धार्मिक पुण्य देता है, बल्कि मन में संतोष और करुणा का भाव भी जाग्रत करता है। यह व्रत व्यक्ति को केवल अपने सुख तक सीमित नहीं रखता, बल्कि दूसरों के कल्याण की भावना से भी जोड़ता है। यही कारण है कि इस व्रत को सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी उपयोगी माना गया है। आध्यात्मिक स्तर पर जानकी जयंती का व्रत व्यक्ति के चरित्र निर्माण में सहायक माना जाता है। माता सीता का जीवन सत्य, धर्म और मर्यादा के मार्ग पर अडिग रहने का संदेश देता है। जब व्रतधारी इस कथा और भाव को आत्मसात करता है, तो उसके व्यवहार में भी सौम्यता और संतुलन आने लगता है। क्रोध, अहंकार और अधैर्य जैसे भाव धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। यह परिवर्तन केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार और आसपास के वातावरण को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। यह भी माना जाता है कि जानकी जयंती का व्रत रखने से आर्थिक और पारिवारिक स्थिरता में भी सुधार होता है। माता सीता को लक्ष्मी स्वरूप माना गया है, इसलिए उनकी कृपा से घर में सुख-समृद्धि और संतुलन बना रहता है। हालांकि यह व्रत किसी तात्कालिक चमत्कार का दावा नहीं करता, लेकिन आस्था और नियमित साधना से जीवन की दिशा धीरे-धीरे सकारात्मक होने लगती है। व्रतधारी के भीतर संयम और अनुशासन आता है, जो किसी भी प्रकार की प्रगति का आधार होता है। समग्र रूप से देखा जाए तो जानकी जयंती का व्रत केवल परंपरा निभाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जीवन को भीतर से सशक्त करने की एक साधना है। यह व्रत व्रतधारियों को रिश्तों में धैर्य, मन में शांति और जीवन में संतुलन प्रदान करने वाला माना जाता है। माता सीता की आराधना से जुड़ी यह आस्था आज भी लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव के उदाहरणों से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि जानकी जयंती न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि उम्मीद, आत्मचिंतन और बेहतर जीवन की ओर बढ़ने का प्रेरक अवसर भी बन गई है। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 08 फरवरी /2026