लेख
08-Feb-2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद के अंदर सुरक्षित नहीं हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का इस आशय का कथन अपने आप में गंभीर है। संसद केवल एक भवन नहीं है, लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था है। संसद में नागरिकों की रक्षा के लिए नियम और कानून बनाए जाते हैं। उन्हीं नियमों और कानूनों से कार्यपालिका नागरिकों को यह भरोसा दिलाती है कि सरकार उनके हित में काम कर रही है। सरकार उनकी सुरक्षा, उनके जीवन-यापन तथा शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विषयों पर काम कर रही है। 1947 के बाद से आम जनता का भरोसा संसद पर बना हुआ है। यदि उसी संसद मे सदन का नेता सुरक्षित नहीं है? इस लोकसभा के अध्यक्ष जो सदन मे सभी निर्वाचित सदस्यों के संरक्षक हैं। संविधान ने उन्हें सत्ता पक्ष और विपक्ष को संविधान का पालन कराने का अधिकार दिया हुआ है। यदि वह इस तरह की बात करते हैं, तो निश्चित रूप से 140 करोड़ जनता के मन में यह सवाल उठता है, यदि इतनी सुरक्षा प्राप्त प्रधानमंत्री सदन के अंदर सुरक्षित नहीं हैं, जिस सदन में मार्शल हटाकर सीआरपीएफ सुरक्षा बल के जवान लगाए गए हैं। ऐसी स्थिति में आम नागरिकों का क्या होगा? यदि यह आरोप सार्वजनिक विचार-विमर्श का हिस्सा बनता है तो उसका असर केवल सुरक्षा बहस तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह राजनीतिक संदेश, संसदीय मर्यादा] जनविश्वास और विश्व में भारत के लोकतंत्र को लेकर सवाल वाली स्थिति बनती है। यहां पर सवाल प्रधानमंत्री की सुरक्षा का है। संसद देश के सबसे सुरक्षित स्थलों में मानी जाती है। बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया निगरानी और प्रोटोकॉल पहले से मौजूद हैं। ऐसे में यदि कोई नेता विशेषकर प्रधानमंत्री सदन के अंदर असुरक्षित हैं, तो यह सुरक्षा एजेंसियों, लोकसभा सचिवालय और लोकसभा अध्यक्ष के लिए चिंता और समीक्षा का विषय है। लोकसभा अध्यक्ष के ऊपर सदन की तथा सदस्यों की सुरक्षा और उनके कार्य प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका है। सदन की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी है। यदि वही कहते हैं कि प्रधानमंत्री सदन के अंदर सुरक्षित नहीं है। ऐसे में यह उनकी ही अक्षमता का प्रमाण माना जा सकता है। उन्हें राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर तथ्यों के आधार पर स्थिति को बिना किसी भेदभाव के स्पष्ट करनी चाहिए। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में प्रधानमंत्री का नहीं बोलना और लोकसभा अध्यक्ष का यह कहना कि प्रधानमंत्री के ऊपर हमला हो सकता था, इसलिए उन्होंने उन्हें सदन में आने से मना किया था। लोकसभा अध्यक्ष का यह कथन स्वयं लोकसभा अध्यक्ष और सत्तापक्ष के लिए दोधारी तलवार बन गया है। इससे सत्ता पक्ष के समर्थकों में यह संदेश जायेगा कि प्रधानमंत्री निरंतर खतरे में रहकर भी काम कर रहे हैं। जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सहानुभूति मिल सकती है। दूसरी ओर विपक्ष इसे राजनीतिक नाटकीयता बताकर सवाल उठायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास इतनी ज्यादा सुरक्षा है वह प्रधानमंत्री होते हुए जब वह सदन के अंदर ही सुरक्षित नहीं है उनकी छवि पर विपक्ष तीखा प्रहार करते हुए इसका राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास करेगा। इसका असर आम जनता के बीच में हो सकता है कि जब प्रधानमंत्री ही सदन के अंदर सुरक्षित नहीं हैं तो वह हमारी रक्षा किस तरह से कर पाएंगे। जो छवि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बना रखी है उनकी उस छवि पर विपक्ष गहरा आघात करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। सरकार के सुरक्षा तंत्र पर प्रधानमंत्री को भरोसा नहीं है। वही तंत्र आम आदमी को कैसी सुरक्षा दे पाएगा। इस विवाद में भाजपा को अल्पकालिक राजनीतिक लाभ अपने पेशेंस को और समर्थकों से मिल सकता है। आम जनता और सरकारी मशीनरी की संस्थाओं पर अविश्वास और सत्ता पक्ष की कमजोरी का संदेश जाना तय है। इस मामले में लोकतांत्रिक संस्कृति जिसमे संसद मे बहस, असहमति और जवाबदेही का लोकतंत्र का जो सबसे बड़ा मंच है, यदि वहां राजनीतिक टकराव और साजिश के कारण इस तरह के उदाहरण और भाषा का उपयोग होने लगे तो उसके बाद देश की सुरक्षा ऒर लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता है। असहमति को खतरे के रूप में नहीं, लोकतंत्र की शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। पिछले 70 सालों में सदन के अंदर बहुत तीखे वाद विवाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में हुए हैं। 2004 में भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर तत्कालीन विपक्ष भाजपा के नेताओं और सांसदों ने उनके खिलाफ बेल में जाकर वर्तमान की तुलना में और ज्यादा हंगामा किया था। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार का पक्ष रखा, विपक्ष विरोध भी करता रहा। सदन पक्ष और विपक्ष से मिलकर बनता है। सदन के अध्यक्ष सभी सदस्यों के पालक होते हैं। पिछले कुछ समय से अध्यक्ष की भूमिका को लेकर विपक्षी सदस्यों द्वारा शिकायतें दर्ज होती रही हैं। विपक्ष को बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा है। इसके बाद भी अध्यक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह चाहे सत्ता पक्ष का सांसद हो या विपक्ष का सांसद हो सभी के साथ समान रूप से व्यवहार करें। प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और सभी राजनीतिक दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है, संसद को राजनीतिक संघर्ष और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अखाड़ा नहीं बनने दें। संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में संवाद बनाने के लिए अध्यक्ष की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होती है। इसके पहले भी समय-समय पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में सदन के अंदर भारी टकराव देखने को मिले हैं, ऐसी स्थिति में अध्यक्ष की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती थी। वह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में समन्वय बनाने की भूमिका अपनाते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से अध्यक्ष और विपक्ष के रिश्ते में जो विश्वास होना चाहिए था वह देखने को नहीं मिलता है, जो समस्या का सबसे बड़ा कारण भी बनता चला जा रहा है। सदन के अंदर प्रधानमंत्री, मंत्री की नहीं बरन सभी सांसदों की सुरक्षा जरूरी है। उससे भी अधिक जरूरी है, जनता का विश्वास संसद और जनप्रतिनिधियों पर बना रहे। जनता का विश्वास संविधान, लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं पर बना रहे। सबसे शीर्ष संस्था संसद है। इसकी स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही लोकतंत्र की असली सुरक्षा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में संवाद होने तथा सदन के अंदर किसी भी विषय पर चर्चा होने के बाद यह माना जाता है कि सरकार अच्छे नियम और कानून तैयार करेगी जिससे लोगों का भला हो। वर्तमान में जो स्थिति बनी है उसके लिए लोकसभा के अध्यक्ष की भूमिका अति महत्वपूर्ण है लेकिन ऐसा लगता है सत्ता पक्ष का दबाव उनके ऊपर बहुत ज्यादा है। पिछले 10 सालों से विपक्ष आक्रामक नहीं था, लेकिन अब विपक्ष आक्रामक है। ऐसी स्थिति में लोकसभा अध्यक्ष को निष्पक्षता के साथ लोकसभा की कार्यवाही चलाने तथा सत्ता पक्ष और विपक्ष को सही मौका मिले इसके लिए एक अच्छे मध्यस्थ और एक अच्छे जज की भूमिका में काम करने की जिम्मेदारी है। आशा है लोकसभा अध्यक्ष अपनी जिम्मेदारी को समझकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के साथ समान व्यवहार करते हुए लोकतांत्रिक परंपराओं को जीवित रखेंगे। ईएमएस / 08 फरवरी 26