बाल तपस्वी। शाजापुर (ईएमएस)। जिस उम्र में बच्चों का मन खेल-कूद और चंचलता में रमता है, उस 13 वर्ष की अबोध आयु में शाजापुर के एक नन्हे बालक ने संयम और त्याग की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने पूरे जैन समाज को गौरवान्वित कर दिया है। 45 दिनों तक परिवार के मोह से दूर, एक जैन मुनि की भांति कठोर जीवन जीने के बाद जब बाल तपस्वी गुनीत दुग्गड़ अपनी कर्मभूमि शाजापुर लौटे, तो पूरा शहर उनके स्वागत में पलक-पांवड़े बिछाए खड़ा मिला। तपोभूमि में गूंजी संयम की गाथा राजस्थान स्थित पावन तीर्थ श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ में आचार्य भगवंत श्रीजीतरत्न विजयजी म.सा. के सानिध्य में आयोजित भव्य उपधान तपाराधना में गुनीत ने वह कर दिखाया जो बड़ों के लिए भी दुष्कर होता है। नगर के श्रावक मंगलेश दुग्गड़ के पुत्र गुनीत ने 21 दिसंबर से 8 फरवरी तक चली साधना में न केवल हिस्सा लिया, बल्कि सबसे कम उम्र के 13 वर्षीय तपस्वी के रूप में 45 दिनों तक साधुचर्या का कठोरता से पालन किया। इतिहास में पहली बार, बाल हठ नहीं, यह थी तप हठ यह शाजापुर जैन समाज के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाने वाला क्षण है। पहली बार इतनी अल्पायु के किसी बालक ने उपधान तप की उग्र आराधना सकुशल पूर्ण की है। कड़ाके की ठंड में नियमित उपवास, एकासने, आयंबिल और प्रतिक्रमण जैसी क्रियाएं करते हुए गुनीत ने 35 अन्य तपस्वियों के बीच अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया। वरघोड़े में उमड़ी श्रद्धा की लहर सोमवार सुबह 9 बजे जब बाल तपस्वी का वरघोड़ा पिपली गली से आरंभ हुआ, तो दृश्य देखने लायक था। नई सड़क, आजाद चौक और कसेरा बाजार होते हुए जब यह धर्मयात्रा ओसवाल सेरी स्थित चौबीस जिनालय धाम पहुंची, तो जयकारों से आकाश गूंज उठा। समाजजनों ने पुष्पवर्षा कर बाल तपस्वी का आत्मीय बहुमान किया और उनकी अनुमोदना की। ईएमएस/राजेश कलजोरिया/ 09 फरवरी 2026