- भैसवामाता के कार्यक्रम मे नही आना कई प्रश्नो को कर गया खडा (नरेन्द्र जैन) सारंगपुर (ईएमएस)। सारंगपुर तहसील के भैसवा माता में मंगलवार को आयोजित कांग्रेस का ग्राम पंचायत सम्मेलन राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया। मंच पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और जिलाध्यक्ष प्रियव्रत सिंह की मौजूदगी ने आयोजन को वजन तो दिया, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह की अनुपस्थिति ने संगठन के भीतर कई अनकहे सवाल खड़े कर दिए। जबकि आमंत्रण सूची मे जयवर्धनसिह व उमंग सिंघार का नाम भी था। राजगढ़- जहां आज भी दिग्विजयसिंह का असर वास्तविकता यह है कि राजगढ़ जिला लंबे समय से दिग्विजय सिंह का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। संगठन से लेकर कार्यकर्ता नेटवर्क तक, आज भी उनके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। कांग्रेस के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिले में दिग्विजय सिंह के बिना संगठन की धड़कन धीमी पड़ जाती है। बीते वर्षों से उनका जिले से दूरी बनाना और फिर लोकसभा चुनाव में उसका असर कार्यकर्ताओं के मन में टीस छोड़ गया। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर उनके प्रति जुनून कम नहीं हुआ है। दिग्विजय सिंह के बाद यदि किसी नेता के प्रति सबसे अधिक स्वीकार्यता दिखती है, तो वह जयवर्धन सिंह हैं। युवा कार्यकर्ताओं, समर्थकों और बूथ स्तर के नेताओं में उनकी पकड़ आज भी मजबूत है। कई कांग्रेसजन मानते हैं कि जयवर्धन सिह को राजगढ़ में खुला मैदान (फ्री हैंड) नहीं मिल पाया और उन्हें गुना तक सीमित कर दिया गया यह संगठन की रणनीतिक चूक रही। कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि उन्हें संगठनात्मक फैसलों, कार्यकर्ता चयन, बूथ सशक्तिकरण और राजनीतिक रणनीति में, ( फ्री हेन्ड ) स्वतंत्र भूमिका दी जाती है, तो कांग्रेस फिर से जमीन पर मजबूत हो सकती है। गैर-मौजूदगी क्या दे रही है संदेश भैसवा माता में प्रदेश नेतृत्व की मौजूदगी के बावजूद दोनों दिग्गजों की अनुपस्थिति ने यह सवाल स्वाभाविक बना दिया है—क्या यह केवल संयोग था, या संगठन के भीतर समन्वय की कमी का संकेत? कार्यकर्ताओं की राय में, राजगढ़ जैसे जिले में कांग्रेस तब तक पूरी ताकत में नहीं आ सकती है जब तक दिग्विजय सिंह का मार्गदर्शन और जयवर्धन सिंह की सक्रिय भूमिका साथ-साथ न दिखे। कांग्रेस के समर्पित लोगों की साफ राय है कि दिग्विजय सिंह और जयवर्धन सिंह दोनों के बिना राजगढ़ में कांग्रेस अधूरी ही रहेगी। लचर कार्यशैली ने कांग्रेस को किया कमजोर इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम पहलू यह भी है कि पिछले कुछ वर्षों से जिले की कमान जिन नेताओं के हाथों में रही, उनकी लचर और दिशाहीन कार्यशैली ने कांग्रेस संगठन को गंभीर रूप से कमजोर किया। संगठन विस्तार, आंदोलनों, कार्यकर्ता संवाद और चुनावी तैयारी—हर स्तर पर निष्क्रियता और आपसी गुटबाजी हावी रही। इसका सीधा नुकसान यह हुआ कि कांग्रेस के निष्ठावान, जमीन से जुड़े और संघर्षशील कार्यकर्ता धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए, जबकि संगठन कुछ सीमित चेहरों और तक सिमटकर रह गया। यही कारण रहा कि चुनावों में कांग्रेस को जिले में लगातार निराशाजनक परिणामों का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता स्पष्ट कहते हैं कि यदि पार्टी को राजगढ़ में फिर से धार देनी है, तो दिग्विजय सिंह को जिले के रणनीतिक फैसलों में निर्णायक भूमिका देनी होगी, जयवर्धन सिंह को राजगढ़ में फ्री हैंड देकर संगठनात्मक विस्तार, युवा नेतृत्व और बूथ-स्तरीय मजबूती की जिम्मेदारी सौंपनी होगी, दरबार’ के हाथों में कमान,अब असली परीक्षा अब जबकि जिले की कमान ‘दरबार’ के हाथों में आ चुकी है, तो कांग्रेस संगठन की असली अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है। सवाल केवल कार्यक्रमों और मंचों का नहीं, बल्कि यह है किक्या निष्ठावान कार्यकर्ताओं को फिर से सम्मान और भूमिका मिलेगी? और क्या दिग्विजय सिंह के अनुभव व जयवर्धन सिंह की ऊर्जा का सही उपयोग किया जाएगा? आने वाला समय तय करेगा कि ‘दरबार’ के हाथों में आई यह कमान कांग्रेस संगठन को नई जान फूंकती है या फिर वही पुरानी कमजोरियां दोहराई जाती रहेगी। भैसवा माता के सम्मेलन मे दोनों प्रमुख चेहरों की गैर-मौजूदगी ने जो खालीपन छोड़ा, वही आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल है। राजगढ़ में कांग्रेस की अधूरी तस्वीर को पूरा करने के लिए अब नेतृत्व को ठोस, साहसी और समन्वित निर्णय लेने होंगे वरना कार्यकर्ताओं का उत्साह मंचों तक ही सीमित रह जाएगा। नरेन्द्र जैन / 12 फरवरी 26