राष्ट्रीय
14-Feb-2026
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नई दिल्ली(ईएमएस)। भारतीय न्यायपालिका के समक्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल कानूनी प्रश्न खड़ा हुआ है, जो भविष्य में वैवाहिक और लिव-इन संबंधों की कानूनी व्याख्या को बदल सकता है। प्रश्न यह है कि क्या एक विवाहित व्यक्ति, जो अपनी पत्नी के जीवित रहते हुए किसी अन्य महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, उस पर उसकी लिव-इन पार्टनर द्वारा दहेज प्रताड़ना (आईपीसी की धारा 498ए) का मामला दर्ज कराया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय ने अब इस गंभीर कानूनी बिंदु पर विस्तार से विचार करने का निर्णय लिया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (अब भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत) स्पष्ट रूप से प्रावधान करती है कि केवल एक पत्नी ही अपने पति या उसके रिश्तेदारों के खिलाफ दहेज के लिए क्रूरता की शिकायत दर्ज करा सकती है। चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक व्यक्ति कानूनी रूप से एक ही समय में दो पत्नियां नहीं रख सकता, इसलिए कानूनी गलियारों में यह बहस छिड़ गई है कि क्या एक लिव-इन पार्टनर को कानूनन पत्नी का दर्जा दिया जा सकता है, विशेषकर तब जब पुरुष पहले से विवाहित हो।यह मामला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन के सिंह की पीठ के समक्ष डॉक्टर लोकेश बी.एच. द्वारा दायर एक याचिका के जरिए आया है। मामले के विवरण के अनुसार, लोकेश ने फरवरी 2000 में नवीना नामक महिला से विवाह किया था। आरोप है कि उन्होंने 2010 में तीर्थ नामक एक अन्य महिला से भी विवाह किया, जिसे कानूनी रूप से अवैध माना जा रहा है। तीर्थ ने साल 2016 में लोकेश पर दहेज की मांग को लेकर शारीरिक प्रताड़ना और जलाने के प्रयास का गंभीर आरोप लगाया था। इसके बाद घरेलू हिंसा का मामला भी दर्ज कराया गया। याचिकाकर्ता लोकेश ने तर्क दिया है कि तीर्थ के साथ उनका कोई वैध कानूनी वैवाहिक संबंध नहीं है, इसलिए उन पर धारा 498ए के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने इस संबंध में बेंगलुरु की एक पारिवारिक अदालत में घोषणा के लिए मुकदमा भी दायर किया है, जो वर्तमान में लंबित है। इसके अतिरिक्त, लोकेश के नियोक्ता ने प्रमाणित किया है कि कथित घटना वाले दिन वह अस्पताल में अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। इससे पहले कर्नाटक उच्च न्यायालय ने लोकेश की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता और इसके व्यापक कानूनी प्रभावों को देखते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को इस मामले में सहयोग करने के लिए कहा है। साथ ही, वरिष्ठ अधिवक्ता नीना नरिमन को एमिकस क्यूरी (अदालत का मित्र) नियुक्त किया गया है, जो इस जटिल कानूनी मुद्दे पर निष्पक्ष और विस्तृत राय प्रदान करेंगी।याचिकाकर्ता के वकील संजय नुली ने दलील दी कि कानून की शब्दावली में पति और पत्नी शब्द स्पष्ट हैं और इसे लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं किया जा सकता। यदि सर्वोच्च न्यायालय लिव-इन पार्टनर को इस धारा के दायरे में लाने का निर्णय लेता है, तो यह पारंपरिक वैवाहिक कानूनों की व्याख्या में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव होगा। पूरे देश की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि क्या कानून लिव-इन को विवाह के समान संरक्षण प्रदान करेगा या नहीं। वीरेंद्र/ईएमएस/14फरवरी2026