ढाका (ईएमएस)। बांग्लादेश में हालिया चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने कुल 68 सीटें जीतकर राजनीतिक हलचल मचा दी है, जिसमें से 51 सीटें भारत की सीमा से सटे जिलों में हैं। यह नजदीकी भारत के लिए सुरक्षा और सामरिक दृष्टिकोण से चिंताजनक हैं। जमात के अमीर शफीकुर रहमान ने चुनाव से पहले भारत के साथ दोस्ताना रिश्तों का आश्वासन दिया था, लेकिन यह बयान घरेलू और क्षेत्रीय राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दिया गया है। सीमावर्ती जिलों जैसे निलफामारी, रंगपुर, कुरीग्राम, गैबांधा, चपैनवाबगंज, राजशाही, कुश्तिया, झेनैदा, जेसोर, सतखीरा और खुलना में जमात की पकड़ मजबूत हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह संगठन इन क्षेत्रों में लंबे समय से चुपके से काम कर रहा था। भारतीय सुरक्षा विश्लेषक फिलहाल इस स्थिति का अध्ययन कर रहे हैं ताकि सीमावर्ती क्षेत्रों में संभावित राजनीतिक और सामरिक खतरे का आकलन किया जा सके। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम के सीमावर्ती जिले जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, सिलीगुड़ी और कोच बिहार—जमात की उभरती राजनीतिक गतिविधियों के लिए संवेदनशील माने जा रहे हैं। ढाका के विश्लेषकों के अनुसार, इन क्षेत्रों में जमात की जीत का एक कारण भारत से आए मुसलमानों के वंशजों का बढ़ता प्रभाव और उनकी राजनीतिक सक्रियता है। हालांकि शफीकुर रहमान ने भारत के साथ सहयोग की बात कही है, सीमावर्ती जिलों में कट्टरपंथी राजनीतिक ताकतों की बढ़ती उपस्थिति और हिंसक राजनीति का रुझान भविष्य में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा साबित हो सकता है। इस वजह से न केवल बांग्लादेश बल्कि भारत के पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल के जिलों में सतर्कता जरूरी हो गई है। इस तरह, जमात-ए-इस्लामी की सीमावर्ती सफलता ने राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा के स्तर पर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। आशीष दुबे/ 14 फरवरी 2026