ढाका (ईएमएस)। बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में पिछले दो दशकों से चले आ रहे गतिरोध को समाप्त करते हुए तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने अपने सहयोगियों के साथ आम चुनावों में एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। घोषित की गई 297 सीटों में से 212 पर शानदार कब्जा जमाकर बीएनपी ने न केवल संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है, बल्कि 20 साल के लंबे अंतराल के बाद सत्ता में वापसी भी की है। हालांकि, जहां एक ओर बांग्लादेश में जश्न का माहौल है, वहीं दूसरी ओर इस चुनावी परिणाम ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों और नीति निर्धारकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बीएनपी की जीत से ज्यादा उसके सहयोगी दल जमात-ए-इस्लामी और उसके 11 अन्य सहयोगियों द्वारा 77 सीटों पर दर्ज की गई प्रभावशाली जीत है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी का बढ़ता राजनीतिक कद सीमा पार के समीकरणों को बदल सकता है। विशेष रूप से गौर करने वाली बात यह है कि जमात ने जिन सीटों पर जीत हासिल की है, उनमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल और असम की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे बांग्लादेशी जिलों में स्थित है। सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज के विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि शेख हसीना की अवामी लीग के चुनावी परिदृश्य से बाहर होने के बाद मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात के बीच ही सिमट गया था। यह परिणाम संकेत देते हैं कि आने वाले समय में बांग्लादेश के 1972 के संविधान में बड़े संशोधनों के प्रयास किए जा सकते हैं, जो क्षेत्र की भू-राजनीति को प्रभावित करेंगे। जमात-ए-इस्लामी का प्रभाव अब पश्चिम बंगाल के छह प्रमुख सीमावर्ती जिलों जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना के साथ-साथ असम के सिलचर से लगे इलाकों में मजबूती से स्थापित हो गया है। भारतीय खुफिया एजेंसियों और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि सीमा के वे हिस्से जहां अभी तक कटीली तारें नहीं लगी हैं, वे लंबे समय से घुसपैठ, मानव तस्करी और नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए संवेदनशील रहे हैं। इस राजनीतिक बदलाव के बाद भारत ने अपने सीमावर्ती राज्यों को हाई अलर्ट पर रखा है। सुरक्षा के साथ-साथ बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा भी भारत की प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि जमात-ए-इस्लामी ने सार्वजनिक रूप से भारत के प्रति अपने रुख में नरमी दिखाने की कोशिश की है, लेकिन अतीत में अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों को देखते हुए भारत को सतर्क और प्रतीक्षा करो की नीति अपनानी होगी। दिल्ली के लिए ढाका के साथ नए सिरे से राजनयिक संबंध बनाना और क्षेत्र में शक्ति संतुलन सुनिश्चित करना एक कठिन कूटनीतिक कार्य होगा। आतंकवाद के मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। खुफिया विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) जैसे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है। जेएमबी ने पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल और कोलकाता में अपना नेटवर्क फैलाया है, जहां 2020 से 2025 के बीच कई ऑपरेटर गिरफ्तार किए गए हैं। हाल ही में दिसंबर 2025 में भी जेएमबी के सदस्यों को कड़ी सजा सुनाई गई थी, जिनके पास से भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद हुए थे। ऐसे में बांग्लादेश में कट्टरपंथी विचारधारा वाले संगठनों को मिलने वाला कोई भी राजनीतिक संरक्षण भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है। भारत अब इस नई सत्ता के साथ सुरक्षा और सहयोग के बीच एक बारीक संतुलन बनाने की कोशिश करेगा। वीरेंद्र/ईएमएस 15 फरवरी 2026