काहिरा,(ईएमएस)। 20वीं सदी की शुरुआत में खोजने के बाद से ही मिस्र की वैली ऑफ किंग्स दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। नील नदी की घाटी में मौजूद इस जगह पर तीन हजार साल से भी पहले मिस्र के न्यू किंगडम पर राज करने वाले फिरौन की क्रब है। हजारों सालों में इस जगह पर विजिटर्स ने अपने निशान छोड़े हैं। इनमें कुछ निशान इसतरह के थे जिन पर करीब एक सदी तक किसी का ध्यान नहीं गया। ये निशान भारतीय थे, जो ये साबित करते हैं कि भारतीय व्यापारी 2000 साल पहले मिस्र तक गए थे। शोधकर्ताओं ने मिस्र में राजाओं की घाटी के उच्च सुरक्षा वाले शाही मकबरों के अंदर 2,000 साल पुराने तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों की खोज की है। स्विट्जरलैंड के विद्वान प्रोफेसर ने अंतरराष्ट्रीय तमिल पुरालेख सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के दौरान अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया। ये निष्कर्ष इसकी पुष्टि करते हैं कि प्राचीन तमिल व्यापारी अन्वेषण और पर्यटन के लिए मिस्र के आंतरिक भागों तक की यात्रा करते थे। प्रोफेसर स्ट्रॉच ने रामेसेस-6 के मकबरे सहित चट्टानों को काटकर बनाई गई छह कब्रों में तमिल-ब्राह्मी और प्राकृत में लिखे करीब 30 शिलालेखों का दस्तावेजीकरण किया। सबसे महत्वपूर्ण खोज ‘सिकई कोर्रान’ (प्राचीन तमिलभाषी व्यापारी के लिए प्रयुक्त) नाम है, जो आठ अलग-अलग स्थानों पर पाया जाता है। शोधकर्ताओं ने रेखांकित किया कि शिलालेख में विशेष रूप से ‘सिकई कोर्रान वरा कांता’ लिखा है, जिसका अनुवाद ‘ सिकई कोर्रानआये और देखे’ गए होता है, जो उसी परिसर में पाए जाने वाले यूनानी पर्यटक भित्तिचित्रों की शैली से मेल खाते हैं। प्रोफेसर ने सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों को संबोधित कर कहा कि हालांकि मिस्र में तमिलों की उपस्थिति के पहले के साक्ष्य बेरेनिके जैसे बंदरगाह शहरों तक ही सीमित थे, लेकिन ये शिलालेख साबित करते हैं कि भारतीय व्यापारी केवल इलाके से गुजरने वाले नाविक भर नहीं थे। उन्होंने रेखांकित किया कि व्यापारी लंबे समय तक ठहरते थे और उसमें तट से दूर स्थित अंतर्देशीय विरासत स्थलों का दौरा करने की जिज्ञासा होती थी। प्रोफेसर ने कहा कि ‘सिकई’ नाम का अर्थ है गुच्छा या मुकुट, और कोर्रान नाम का अर्थ है नेता, जो यह दर्शाता है कि वह व्यक्ति प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के व्यापारी संघों में महत्वपूर्ण स्थिति का व्यक्ति था। तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा आयोजित सम्मेलन का उद्घाटन राज्य के वित्त और पुरातत्व मंत्री थंगम तेन्नारासु ने किया। इस मौके पर मंत्री ने रेखांकित किया कि शिलालेख समाज का एक प्रामाणिक कालानुक्रमिक रिकॉर्ड प्रदान करते हैं, जो बाद के साहित्यिक कार्यों में अक्सर पाए जाने अनुमानों से मुक्त हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि भारत में प्रलेखित शिलालेखों में से लगभग 30,000 तमिलनाडु में पाए जाते हैं, जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर अब तक का एक अटूट इतिहास प्रस्तुत करते हैं। यह सम्मेलन 14 फरवरी को समाप्त होगा। आशीष/ईएमएस 17 फरवरी 2026