हाल के वर्षों में उपग्रह तस्वीरों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह संकेत मिले हैं कि चीन अपने सामरिक ढांचे को तेजी से मजबूत कर रहा है। दक्षिण-पश्चिमी प्रांतों में पहाड़ों के भीतर बने बड़े-बड़े बंकर, भूमिगत सुरंगें और अत्याधुनिक सुविधाएं इस ओर इशारा करती हैं कि बीजिंग अपनी दीर्घकालिक रणनीति पर चुपचाप काम कर रहा है। ऐसे समय में जब वह भारत के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने और सहयोग बढ़ाने की बात करता है, यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या चीन वास्तव में भरोसेमंद साझेदार बनना चाहता है या यह उसकी रणनीतिक नीति का हिस्सा है। इतिहास गवाह है कि भारत और चीन के संबंधों में विश्वास की कमी की जड़ें गहरी हैं। वर्ष 1962 में चीन द्वारा भारत पर किया गया हमला दोनों देशों के रिश्तों में एक स्थायी अविश्वास की दीवार खड़ी कर गया। उसके बाद से सीमा विवाद, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव और समय-समय पर होने वाली झड़पों ने यह स्पष्ट किया कि संबंधों में गर्मजोशी और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर है। चीन ने कई बार शांति और सहयोग की बात की, लेकिन समानांतर रूप से अपनी सैन्य और सामरिक ताकत को भी बढ़ाया। चीन की विदेश नीति को समझने के लिए उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को देखना जरूरी है। वह तात्कालिक भावनाओं के बजाय दशकों आगे की योजना बनाकर चलता है। उसकी प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और विस्तार है। चाहे वह दक्षिण चीन सागर हो, ताइवान का मुद्दा हो या हिमालयी सीमा हर जगह उसकी नीति शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में झुकाने की रही है। ऐसे में यदि वह भारत के साथ रिश्ते सुधारने की पहल करता है, तो यह केवल सद्भावना का परिणाम नहीं बल्कि एक सुविचारित रणनीति भी हो सकती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में चीन कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक तनाव, तकनीकी प्रतिबंध और सामरिक प्रतिस्पर्धा ने उसे नए संतुलन की तलाश में डाल दिया है। भारत एक उभरती हुई आर्थिक और सामरिक शक्ति है। एशिया में स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए भारत के साथ टकराव चीन के हित में नहीं है। इसलिए संभव है कि वह सीमित सहयोग और नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की नीति अपनाए, ताकि वह एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष से बच सके। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि चीन की नीतियों में पारदर्शिता का अभाव रहा है। उसकी सैन्य तैयारियों और परमाणु ढांचे के विस्तार को लेकर अक्सर बाहरी दुनिया को सीमित जानकारी ही मिलती है। यदि उपग्रह तस्वीरों में दिखाई देने वाले निर्माण सचमुच सामरिक क्षमताओं के विस्तार का संकेत हैं, तो यह भारत सहित पूरे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय है। एक ओर संवाद और व्यापार की बातें, दूसरी ओर पहाड़ों के भीतर बनते ठिकान यह दोहरी तस्वीर सहज भरोसा पैदा नहीं करती। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वह चीन के इरादों को कैसे परखे। केवल बयानों के आधार पर विश्वास करना रणनीतिक भूल हो सकती है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संवाद के द्वार खुले रखने होंगे। कूटनीति में संतुलन और सैन्य तैयारी में सतर्कता दोनों समान रूप से जरूरी हैं। चीन के साथ संबंधों को पूरी तरह टकराव की दिशा में ले जाना भी समझदारी नहीं होगी, क्योंकि दोनों देश एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और परस्पर निर्भरता भी बढ़ी है। चीन की नियति को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि वह वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखता है। उसकी बेल्ट एंड रोड पहल, तकनीकी निवेश और वैश्विक संस्थाओं में बढ़ती भूमिका इस दिशा का संकेत देती है। ऐसे में वह भारत को प्रतिस्पर्धी भी मानता है और संभावित साझेदार भी। यदि भारत उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए चुनौती बनता है, तो प्रतिस्पर्धा तीखी हो सकती है। लेकिन यदि भारत संतुलित और आत्मविश्वासी नीति अपनाता है, तो सहयोग के अवसर भी बन सकते हैं। भरोसे का निर्माण केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से होता है। सीमा पर शांति, समझौतों का पालन और पारदर्शिता ये वे कसौटियां हैं जिन पर चीन को परखा जाएगा। यदि वह सचमुच स्थिर और सकारात्मक संबंध चाहता है, तो उसे ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा, इतिहास का अनुभव यही बताता है कि रणनीतिक मित्रता के पीछे छिपी चालों को समझने में देर नहीं लगती। भारत को भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। चीन न तो पूरी तरह भरोसेमंद मित्र है और न ही अनिवार्य शत्रु। वह एक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर राष्ट्र है, जिसकी प्राथमिकता उसके अपने हित हैं। भारत के साथ उसके संबंध भी इन्हीं हितों की कसौटी पर तय होंगे। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि चीन सहयोग की राह चुनता है या प्रतिस्पर्धा और दबाव की नीति पर कायम रहता है। भारत के लिए जरूरी है कि वह सतर्कता, आत्मनिर्भरता और संतुलित कूटनीति के सहारे हर संभावित परिस्थिति के लिए तैयार रहे। (L103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नंदालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 17 फरवरी 25