लेख
20-Feb-2026
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तंबाकू केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना और नैतिक मूल्यों को भी अंदर से खोखला कर रहा है- व्यापक और कठोर विधायी प्रतिबंध लागू करना जरूरी वैश्विक स्तरपर तंबाकू का सेवन आज केवल एक व्यक्तिगत आदत या सामाजिक व्यवहार का विषय नहीं रह गया है,बल्कि यह एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा का रूप ले चुका है।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व स्तरपर प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख लोगों की मृत्यु तंबाकू जनित बीमारियों के कारण होती है। यह आंकड़ा किसी युद्ध, प्राकृतिक आपदा या महामारी से कम नहीं है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में तंबाकू का प्रभाव और भी गंभीर है,जहाँ लाखों लोग प्रतिवर्ष कैंसर, हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारियों और अन्यजटिलताओं के कारण असमय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि तंबाकू केवल शरीर को ही नहीं,बल्कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था सामाजिक संरचना और नैतिक मूल्यों को भी अंदर से खोखला कर रहा है। ऐसे परिदृश्य में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या केवल कर वृद्धि और चेतावनी संदेश पर्याप्त हैं?या फिर अब समय आ गया है कि भारत में तंबाकू पर व्यापक और कठोर विधायी प्रतिबंध लागू किया जाए। स्वास्थ्य की दृष्टि से तंबाकू का प्रभाव बहुआयामी और घातक है। धूम्रपान और धुंआ रहित तंबाकू दोनों ही शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित करते हैं। फेफड़ों का कैंसर, मुख कैंसर, गले का कैंसर,हृदयाघात,स्ट्रोक,क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज जैसी बीमारियाँ तंबाकू सेवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हैं। भारत में विशेष रूप से मुंह के कैंसर के मामलों की संख्या अत्यधिक है, जिसका मुख्य कारण गुटखा, पान मसाला और अन्य धुंआ रहित तंबाकू उत्पाद हैं। यह स्थिति केवल सक्रिय उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है। पैसिव स्मोकिंग यानी दूसरों के धुएँ के संपर्क में आने से बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का सामना करते हैं। गर्भवती महिलाओं पर इसका प्रभाव भ्रूण के विकास को बाधित कर सकता है, जिससे कम वजन वाले शिशु जन्म लेते हैं या जन्मजात विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। तंबाकू प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है, जिससे टीबी जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इस प्रकार तंबाकू एक ऐसी महामारी है जो गैर- संचारी और संक्रामक दोनों प्रकार की बीमारियों को बहुत तेजी से बढ़ावा देती है। साथियों बात अगर हम भारत में तंबाकू नियंत्रण के लिए पहले से मौजूद कानूनों को समझने की करें तो, जैसे सिगरेटटेस अदर टोबैक्को प्रोडक्ट्स एक्ट 2003, जो सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध,विज्ञापन प्रतिबंध और पैकेजिंग पर स्वास्थ्य चेतावनी जैसे प्रावधान करता है। शहर अनेकों कानून है अनेक राज्यों में तंबाकू पर प्रतिबंध भी है इसके अतिरिक्त भारत ने डब्लूएचओ फ्रेमवर्क कान्वेंशन ऑन टोबैको कण्ट्रोल पर हस्ताक्षर किए हैं, जो वैश्विक स्तर पर तंबाकू नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण संधि है।बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर तंबाकू की उपलब्धता,सुलभता और सामाजिक स्वीकार्यता कम नहीं हुई है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गुटखा और बीड़ी आसानी से उपलब्ध हैं। छोटे दुकानों और पान ठेलों पर इन्हें खुलेआम बेचा जाता है, जिससे किशोर और युवा वर्ग भी इसके संपर्क में आ जाते हैं।यह दर्शाता है कि वर्तमान व्यवस्था में कठोर प्रवर्तन और व्यापक प्रतिबंध की कमी है। साथियों बात अगर हम सामाजिक दृष्टि से तंबाकू का प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक है इसको समझने की करें तो धूम्रपान करने वाले व्यक्ति अक्सर परिवार में तनाव, आर्थिक दबाव और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण अलगाव का अनुभव करते हैं। जब परिवार का कमाने वाला सदस्य तंबाकू जनित बीमारी से ग्रसित होता है, तो पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक संकट में फँस जाता है। बीड़ी उद्योग जैसे क्षेत्रों में कार्यरत लाखों श्रमिक विशेषकर महिलाएँ और बाल श्रमिक अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में काम करते हैं। वे स्वयं भी तंबाकू धूल और रसायनों के संपर्क में आकर स्वास्थ्य जोखिम उठाते हैं। यह स्थिति सामाजिक असमानता को और गहरा करती है, क्योंकि तंबाकू उद्योग का बोझ मुख्यतः गरीब और अशिक्षित वर्ग पर पड़ता है। जो लोग पहले से आर्थिक रूप से कमजोर हैं, वे तंबाकू पर खर्च करके और अधिक निर्धनता की ओर बढ़ते हैं। इस प्रकार तंबाकू केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का अत्यंत सटीक प्रश्न भी है। साथियों बात कर हम नैतिक दृष्टिकोण से तंबाकू उद्योग की भूमिका गंभीर बहस का विषय है इसको समझने की करें तो जब यह स्पष्ट है कि तंबाकू सेवन से मृत्यु और गंभीर रोग होते हैं, तब भी इसका उत्पादन और विपणन जारी रहना नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। उद्योग का मूल उद्देश्य लाभ कमाना है, परंतु यह लाभ मानव जीवन की कीमत पर प्राप्त होता है। युवाओं को आकर्षित करने के लिए परोक्ष विज्ञापन,फिल्मी दृश्यों में धूम्रपान का ग्लैमराइजेशन और रंगीन पैकेजिंग जैसी रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं। किशोर अवस्था में शुरू हुई लत जीवन भर की निर्भरता बन जाती है। यह आने वाली पीढ़ी की उत्पादकता और स्वास्थ्य को कमजोर करता है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी तंबाकू की खेती और उत्पादन विनाशकारी है।अनुमान है कि लगभग हर 300 सिगरेट के उत्पादन में एक पेड़ काटा जाता है। तंबाकू की खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग भूमि और जल को प्रदूषित करता है। सिगरेट के टुकड़े (बट्स) प्लास्टिक आधारित होते हैं और पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। इस प्रकार तंबाकू केवल मानव स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय नैतिकता के भी विरुद्ध है। साथियों बात अगर हम आर्थिक दृष्टिकोण से तंबाकू का तर्क को समझने की करें तो अक्सर राजस्व पर आधारित होता है। सरकार को तंबाकू उत्पादों से कर प्राप्त होता है, जिसे सार्वजनिक सेवाओं में लगाया जाता है। परंतु जब हम व्यापक आर्थिक विश्लेषण करते हैं, तो स्पष्ट होता है कि तंबाकू से होने वाला कुल आर्थिक नुकसान उसके राजस्व से कहीं अधिक है। तंबाकू जनित बीमारियों के इलाज पर होने वाला प्रत्यक्ष खर्च अस्पताल, दवाएँ, सर्जरी और अप्रत्यक्ष खर्च काम पर अनुपस्थिति, उत्पादकता में कमी, समयपूर्व मृत्यु मिलाकर राष्ट्रीय आय पर भारी बोझ डालते हैं। गरीब परिवार अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा तंबाकू पर खर्च करते हैं, जिससे बच्चों की शिक्षा,पोषण और स्वास्थ्य पर खर्च कम हो जाता है। यह अंतरपीढ़ी गरीबी को बढ़ाता है। यदि तंबाकू से होने वाली बीमारियों और मृत्यु से जुड़ी आर्थिक लागत का समग्र मूल्यांकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होगा कि राष्ट्र को शुद्ध रूप से नुकसान ही हो रहा है। साथियों बात अगर हम सरकार की वर्तमान रणनीति और भविष्य में तंबाकू पर पूर्ण प्रतिबंध कानून को बनाने की करें तो वर्तमान में मुख्यतः कर वृद्धि (टैक्स स्ट्राइक), चेतावनी चित्रों और जनजागरूकता अभियानों पर आधारित है।यह रणनीति कुछ हद तक प्रभावी अवश्य रही है, परंतु पूर्ण समाधान नहीं दे पाई है।जब तकतंबाकू उत्पाद बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, तब तक लत से ग्रसित व्यक्ति उन्हें खरीदने का तरीका खोज लेगा। कर वृद्धि से अवैध व्यापार और तस्करी की संभावना भी बढ़ जाती है। अतः यह तर्क दिया जा सकता है कि अब समय आ गया है कि भारत में तंबाकू,विशेषकर गुटखा और धुंआ रहित उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए व्यापक और कठोर कानून बनाया जाए। राष्ट्रीय तंबाकू निषेध (निर्माण, बिक्री एवं उपभोग निषेध) एवं जनस्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम,2026 तथा भारतीय तंबाकू उत्पाद (निर्माण, भंडारण, परिवहन, बिक्री और आयात) निषेध विधेयक, 2026 जैसे प्रस्तावित विधेयक यदि संसद में प्रस्तुत किए जाते हैं, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम हो सकता है। साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय अनुभवों को समझने की करें तो यहदर्शाते हैं कि कठोर नीतियाँप्रभावी हो सकती हैं। कुछ देशों ने सार्वजनिक स्थानों पर पूर्ण धूम्रपान प्रतिबंध, सादे पैकेजिंग और भारी जुर्माने लागू कर तंबाकू सेवन में उल्लेखनीय कमी लाई है। भारत भी यदि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाए, तो चरणबद्ध तरीके से उत्पादन, वितरण और बिक्री पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है।साथ ही, तंबाकू उद्योग में कार्यरत श्रमिकों के पुनर्वास,वैकल्पिक रोजगार और किसानों के लिए वैकल्पिक फसलों की व्यवस्था आवश्यक होगी, ताकि आर्थिक झटका न्यूनतम रहे। अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करइसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि तंबाकू एक बहुआयामी संकट है,स्वास्थ्य, सामाजिक,नैतिक और आर्थिक सभी स्तरों पर यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं,बल्कि सार्वजनिक हित और भावी पीढ़ियों की सुरक्षा का प्रश्न है। यदि राष्ट्र को स्वस्थ,उत्पादक और नैतिक आधार पर सुदृढ़ बनाना है, तो तंबाकू के विरुद्ध राष्ट्रीय तंबाकू निषेध (निर्माण, बिक्री एवं उपभोग निषेध) एवं जनस्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम, 2026 तथा भारतीय तंबाकू उत्पाद (निर्माण, भंडारण, परिवहन, बिक्री और आयात) निषेध विधेयक, 2026 जैसे प्रस्तावित विधेयक यदि संसद में प्रस्तुत कर निर्णायक कदम उठाना अनिवार्य है। संसद के बजट सत्र में कठोर और व्यापक निषेध कानून प्रस्तुत कर भारत विश्व को यह संदेश दे सकता है कि मानव जीवन और जनस्वास्थ्य किसी भी राजस्व या औद्योगिक हित से ऊपर है। (-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) ईएमएस/20/02/2026