(24 फरवरी: केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस) भारत की आर्थिक प्रगति के पीछे उन हजारों हाथों का योगदान है, जो देश के राजस्व को मजबूत करने के लिए दिन-रात काम करते हैं। इन्हीं प्रयासों को सम्मान देने और आम जनता को कर व्यवस्था के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल 24 फरवरी को देश में एक विशेष अवसर के रूप में इस दिन को मनाया जाता है। यह समय हमारे देश की वित्तीय व्यवस्था के लिए एक मील का पत्थर है, क्योंकि इसी दिन साल 1944 में केंद्रीय उत्पाद शुल्क और नमक कानून बनाया गया था। भले ही आज के दौर में टैक्स की प्रणालियां बदल गई हों और जीएसटी ने एक बड़ा स्थान ले लिया हो, लेकिन देश की तरक्की में उत्पाद शुल्क का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। एक आम नागरिक के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि आखिर टैक्स चुकाने से उसे क्या मिलता है। इसका जवाब बहुत ही सरल और सुंदर है। जब देश की फैक्ट्रियों में सामान बनता है और उस पर सरकार को शुल्क मिलता है, तो वही पैसा घूमकर समाज के कल्याण के लिए वापस आता है। हमारे गाँव और शहरों को जोड़ने वाली पक्की सड़कें, अंधेरे को दूर करती बिजली की रोशनी, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज और देश की सीमाओं पर तैनात वीर जवानों के आधुनिक हथियार, यह सब उसी कर के पैसे से संभव हो पाता है जो एक जिम्मेदार उद्यमी और नागरिक द्वारा चुकाया जाता है। इस प्रकार, कर का भुगतान करना केवल एक कानूनी काम नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राष्ट्र की सेवा करने जैसा है। इसी संदर्भ में यह समझना भी जरूरी है कि एक मजबूत कर प्रणाली ही देश की आंतरिक सुरक्षा और बाहरी खतरों से निपटने की शक्ति प्रदान करती है। जब सरकार के पास पर्याप्त संसाधन होते हैं, तभी नई तकनीकों और आधुनिक बुनियादी ढांचे पर निवेश किया जा सकता है। यह राजस्व ही है जो आपदाओं के समय राहत कार्य चलाने और देश के करोड़ों गरीब परिवारों तक मुफ्त राशन और जरूरी सुविधाएं पहुँचाने में मदद करता है। बिना मजबूत वित्तीय आधार के कोई भी देश अपने नागरिकों के सपनों को पूरा नहीं कर सकता। इसलिए, उत्पाद शुल्क केवल एक सरकारी उगाही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का एक सशक्त माध्यम भी है, जो उद्योगों से कर लेकर समाज के पिछड़े वर्गों के उत्थान में खर्च किया जाता है। समय के साथ सरकारी कामकाज के तरीकों में भी बड़ा बदलाव आया है। आज का दौर डिजिटल क्रांति का है और अब टैक्स चुकाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने या लंबी कतारों में खड़े होने की जरूरत नहीं रह गई है। सरकार ने पूरी प्रक्रिया को इतना सरल और पारदर्शी बना दिया है कि कोई भी व्यापारी घर बैठे अपना हिसाब-किताब पूरा कर सकता है। इससे न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है, बल्कि व्यापार करने में भी आसानी हुई है। यह समय उन अधिकारियों और कर्मचारियों के परिश्रम को भी सलाम करने का है, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि देश का खजाना सुरक्षित रहे और कहीं भी राजस्व की चोरी न हो। इसके साथ ही, हमें यह भी समझना होगा कि कर के माध्यम से एकत्र किया गया धन आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में ईंधन की तरह काम करता है। जब हमारे उद्योग जगत में पारदर्शिता बढ़ती है, तो विदेशी निवेश भी भारत की ओर आकर्षित होता है। यह निवेश न केवल नई फैक्ट्रियां लगाता है, बल्कि देश के लाखों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा करता है। हमारी आर्थिक नीतियां तभी सफल हो सकती हैं जब राजस्व विभाग और करदाता के बीच विश्वास का एक मजबूत रिश्ता हो। यही विश्वास आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंच पर और भी ऊंचा स्थान दिलाएगा। किसी भी महान राष्ट्र का निर्माण केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि वहां के नागरिकों की ईमानदारी से होता है। जब हम ईमानदारी से टैक्स चुकाते हैं, तो हम भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाते हैं। यह अवसर हमें यही सीख देता है कि हमें अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभाना चाहिए। कर की चोरी न केवल अपराध है, बल्कि यह देश के विकास की गति को रोकने जैसा है। एक पारदर्शी और मजबूत कर व्यवस्था ही एक स्वस्थ समाज और शक्तिशाली भारत की पहचान है। आज जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, तब ऐसी संस्थाओं और व्यवस्थाओं की भूमिका और भी बढ़ जाती है। विकसित भारत का सपना तभी सच होगा जब हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझेगा। आइए, आज हम यह संकल्प लें कि हम कर चोरी जैसी बुराइयों को खत्म करने में सहयोग करेंगे और एक ईमानदार करदाता बनकर देश के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखेंगे। हमारी छोटी सी ईमानदारी ही कल के समृद्ध भारत की सबसे बड़ी ताकत बनेगीl (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 23 फरवरी 26