लेख
23-Feb-2026
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भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की खंडपीठ में सोमवार को एक असहज स्थिति देखने को मिली। सुप्रीम कोर्ट के वकील मैथ्यूज नेदुम्पारा की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, अडानी और अंबानी के लिए तुरंत बेंच बना दी जाती है। लेकिन एनजेएसी की महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई नहीं करने का आरोप लगाया। उनका इतना कहते ही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने उन्हें जमकर कोर्ट के अंदर फटकार लगाई। उन्हें मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी दी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, आप जो भी मेरी कोर्ट में पेश कर रहे हैं, उसे लेकर भविष्य में सावधान रहें। आपने मुझे चंडीगढ़ और दिल्ली में देखा है। मैं आपको चेतावनी दे रहा हूं। ऐसा बिल्कुल मत सोचिए, आप जिस तरह की बदतमीजी कर रहे हैं, वैसा आगे भी करते रहेंगे। कुछ इसी तरह की स्थिति शुक्रवार को भी बनी, जब एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश गुस्से में आ गए थे। उन्होंने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। इससे पहले वह वकीलों की तरफ से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीकी की मदद से जो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में पेश की जा रही हैं। उस पर उन्होंने नाराजी व्यक्त की थी। सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका देखकर उन्होंने कहा ऐसा लगता है, भगवान जनहित याचिका के कानून से बचाए। कुछ इसी तरह की स्थिति सुप्रीम कोर्ट में तब देखने को मिली जब असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वा सरमा की हेट स्पीच की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई थी। मुख्य न्यायाधीश ने उस याचिका को सुनने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं को असम हाईकोर्ट जाने के निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित वरिष्ठतम वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश से मामले की सुनवाई करने या असम के अलावा अन्य किसी हाईकोर्ट में तुरंत सुनवाई करने की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश ने असहमति व्यक्त करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। जबकि कई राज्यों की याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए पिछले कुछ महीनो में उसमें आदेश जारी किए हैं। जिन राज्यों की याचिका स्वीकार की गई हैं, उनमें अमूमन डबल इंजन की सरकारें हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर बार-बार सवाल उत्पन्न हो रहे हैं। जिस तरह से वरिष्ठ वकीलों और सुप्रीम कोर्ट की कार्य प्रणाली और सरकारी दबाव पर मामले की सुनवाई को लेकर असहमति बढ़ती चली जा रही है, इससे न्याय पालिका की एक ऐसी छवि विकसित हो रही है। सरकार या सरकार से जुड़े हुए मामलों में सुप्रीम कोर्ट त्वरित सुनवाई करने से बचती है। यदि याचिका स्वीकार हो भी जाती है। नोटिस जारी हो जाते हैं। उसके बाद तारीख पर तारीख का जो नया खेल शुरू होता है, उससे निश्चित रूप से सरकार को मदद होती है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित याचिका, एसआईआर का मामला इन दिनों चर्चाओं में है। बिहार चुनाव के कई माह पहले से याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है, जिसका फैसला अभी तक नहीं आया है। इसी बीच बिहार विधानसभा के चुनाव हो गए। सुप्रीम कोर्ट से तारीख पर तारीख मिल रही है, सुनवाई भी हो रही है, कोई फैसला अभी तक नहीं आया। अगले कुछ ही महीना में पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव होने हैं। जिसके कारण न्यायपालिका की कार्य प्रणाली को चुनाव आयोग या सरकार को फायदा पहुंचाने के रूप में देखा जाने लगा है। करोडों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर जो निर्देश चुनाव आयोग को दिए गए, उनका पालन चुनाव आयोग ने नहीं किया। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को भी चुनौती दे दी। उसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की मनमानी पर कोई रोक नहीं लगाई। पिछले कुछ वर्षों में कई जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए लंबित हैं। उन पर अभी तक सुनवाई शुरू नहीं हुई है। उसके कारण न्याय पालिका की छवि को लेकर आम आदमी में वह विश्वास नहीं रहा, जो न्यायपालिका के प्रति होना चाहिए। न्याय पालिका सरकार के खिलाफ कोई भी आदेश और निर्देश देने से बचती है। ऐसे मामलों से बचने के लिए या तो याचिका स्वीकार नहीं की जा रही हैं, यदि स्वीकार कर ली जाती है, तो उसकी समय पर सुनवाई और फैसला नहीं हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट मामले की सुनवाई के दौरान जिस तरह की टिप्पणी करती हैं। इसका फायदा सरकार या सत्तारूढ़ दल को मिलता हुआ नजर आता है। जब उस मामले का आदेश आता है, सुनवाई के दौरान जो टिप्पणियां की गई थीं, फैसले में कहीं उनका उल्लेख नहीं होता है। इससे भी न्याय पालिका के प्रति अविश्वास देखने को मिल रहा है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं में भी बेचैनी देखने को मिल रही है। दिल्ली में भयानक वायु प्रदूषण था। सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी की मुख्य खंडपीठ दिल्ली में है। केंद्र एवं राज्य में भाजपा की सरकार है। वांगचुक कई महीने से जेल में बंद है। हेवियस कॉरपस में पिछले कई महीनो से सुनवाई चल रही है। और भी कई अन्य मामले हैं, जिसमें तुरंत सुनवाई होकर निर्णय होने थे। ऐसे में न्यायपालिका की एक नई छवि बन रही है। न्यायपालिका सरकार के दबाव में है? वह सरकार के खिलाफ किसी मामले में फैसला करने से बचती है? विवादास्पद मामलों में आधे अधूरे फैसले देकर न्यायपालिका के जज अपने आप को बचाने का प्रयास कर रहे हैं? आम लोगों के बीच में यह चर्चा का विषय बन गया है। न्याय पालिका सरकार के साथ अलग तरीके का व्यवहार करती है। लोग मुखर होकर कहने लगे हैं। जहां डबल इंजन की सरकारें हैं। वहां के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज अलग तरीके से पक्षकारों के साथ व्यवहार करते हैं। जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं, या आम आदमियों से जुड़े हुए गंभीर मामले हैं, उन मामलों पर पहले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट स्वयं संज्ञान लेती थी। अब संज्ञान लेना बंद कर दिया है, यह आम धारणा बनती चली जा रही है। कार्यपालिका और विधायिका के पास असीम शक्तियां हैं। कार्यपालिका द्वारा नागरिकों को प्रताड़ित किया जाता है, ऐसी स्थिति में न्याय पालिका की जिम्मेदारी होती है वह कमजोर पक्ष की सहायता के लिए स्वयं आगे आए। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कोई आदेश करती हैं, उनका पालन सरकारों द्वारा यदि नहीं किया जाता है, उसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की चुप्पी से न्यायपालिका के ऊपर वह विश्वास लोगों को नहीं रहा। जो कुछ वर्षों पहले तक होता था। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की जिम्मेदारी है, वह नागरिकों के विश्वास को बहाल करे। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जिनके ऊपर भारत की संपूर्ण न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। न्याय पालिका में फैले भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने एवं न्याय प्रणाली को बेहतर बनाने की दिशा में बार काउंसिल और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ समीक्षा करते हुए, न्यायालयों की कार्य प्रणाली बेहतर बनाई जाए। अधिवक्ताओं और नागरिकों का भरोसा भारतीय संविधान, भारतीय कानून और न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर मजबूत हो। इस दिशा में त्वरित कार्यवाही करनी होगी। जिस तरह की चुनौतियां देखने को मिल रही हैं, उनका मुकाबला करते हुए न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कायम करना है। संविधान एवं लोकतंत्र की रक्षा के लिए न्याय पालिका को असीम शक्तियां दी गई हैं। इसका जिम्मेदारी के साथ न्यायपालिका को निर्वहन करना होगा। ईएमएस / 23 फरवरी 26