बुरहानपुर (ईएमएस)। 1992 के बाद भारत की सार्वजनिक बहस का स्वरूप तेज़ी से बदला, और 2000 के दशक में सोशल मीडिया के आगमन ने उसे और अधिक तीखा बना दिया। जहाँ पहले सूचनाएँ अख़बारों और टीवी तक सीमित थीं, वहीं अब फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप और एक्स जैसे मंचों ने हर व्यक्ति को प्रकाशक बना दिया। इसका सकारात्मक पहलू यह रहा कि आम नागरिक अपनी आवाज़ सीधे रख सके, लेकिन नकारात्मक पक्ष यह भी सामने आया कि अधूरी, भ्रामक या उत्तेजक सामग्री बहुत तेज़ी से फैलने लगी। 1992 के बाद की संवेदनशील घटनाओं और साम्प्रदायिक मुद्दों को सोशल मीडिया पर बार-बार उछाला गया। ऐसी सामग्री को अधिक दृश्यता देते हैं जो भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करे—क्रोध, भय या आक्रोश। परिणामस्वरूप, ऐतिहासिक घावों को भरने के बजाय कई बार उन्हें कुरेदा गया। अफवाहें और फ़र्ज़ी खबरें समुदायों के बीच अविश्वास को बढ़ाती हैं और वास्तविक सामाजिक-आर्थिक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। फिर भी, सोशल मीडिया केवल विभाजन का माध्यम नहीं है। यही मंच शिक्षा, उद्यमिता और सामाजिक सुधार के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। यदि संसाधन मदरसों के आधुनिकीकरण, डिजिटल साक्षरता और कौशल विकास की दिशा में लगाए जाएँ, तो समुदाय विकास की मुख्यधारा से और मज़बूती से जुड़ सकता है। सर्वोच्च न्यायालय जैसे संवैधानिक संस्थानों के व्यावहारिक मार्ग को समझते हुए संवाद और कानून सम्मत समाधान को प्राथमिकता देना समाज को स्थिरता देता है। आज आवश्यकता है डिजिटल जिम्मेदारी की—तथ्यों की जाँच, संयमित भाषा और दीर्घकालिक सोच की। इतिहास अक्सर निर्माताओं को अधिक सम्मान देता है बनिस्बत आंदोलनकारियों के। इसलिए भविष्य की कल्पना आक्रोश नहीं, बल्कि लचीलापन, शिक्षा और समावेश पर आधारित होनी चाहिए। सोशल मीडिया यदि जागरूकता और विकास का उपकरण बने, तो वही ऊर्जा जो विभाजन को हवा देती है, प्रगति का साधन भी बन सकती है। अकील आजाद/ईएमएस/23/02/2026