राष्ट्रीय
24-Feb-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा के इस्तीफा देने के बाद पार्टी की लगातार गिरती राजनीतिक स्थिति और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। बोरा ने चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है, जिससे संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक कलह तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई राज्यों में कांग्रेस की इकाइयां अंदरूनी गुटबाजी, आपसी अविश्वास और सहयोगी दलों के साथ तालमेल की कमी के कारण हाशिये पर आ रही है। आलोचकों के मुताबिक शीर्ष नेतृत्व की निर्णय प्रक्रिया में कथित ‘सुस्ती’ और समय पर हस्तक्षेप न कर पाने की प्रवृत्ति पार्टी के लगातार क्षरण का कारण बन रही है। कर्नाटक में सीएम सिद्दारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच सत्ता संतुलन को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है। बताया जाता है कि राहुल गांधी की मुलाकातों के बावजूद मतभेद खत्म नहीं हुए हैं। हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू और प्रतिभा सिंह गुटों के बीच प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर संघर्ष जारी है। पार्टी ने राज्य इकाई भंग कर संतुलन साधने की कोशिश की, लेकिन असंतोष बना रहा। दिल्ली में जहां कभी शीला दीक्षित के नेतृत्व में 15 साल तक कांग्रेस की सरकार रही, पार्टी आज एकजुट चेहरा पेश करने में नाकाम है। वहीं हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा के बीच मतभेदों ने 2025 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाया। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच टकराव ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया। बाद में चरणजीत सिंह चन्नी को जिम्मेदारी दी गई, लेकिन तब तक काफी क्षति हो चुकी थी। यूपी में संगठन भंग करने के बावजूद कांग्रेस पुनर्जीवित नहीं हो पाई। पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असम और अरुणाचल प्रदेश में भी पार्टी अव्यवस्था का सामना कर रही है। पश्चिम बंगाल में सीएम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने कांग्रेस से दूरी बना ली है। झारखंड में हेमंत सोरेन की पार्टी के साथ गठबंधन भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। बिहार में राजद के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को ‘बोझ’ के रूप में देखा गया। ओडिशा में संगठन लगातार कमजोर हो रहा है। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच टकराव को 2023 में सत्ता गंवाने की बड़ी वजह माना गया। गुजरात और महाराष्ट्र में भी पार्टी दो दशक से ज्यादा समय से बीजेपी को चुनौती देने में विफल रही है। तमिलनाडु में द्रमुक के साथ गठबंधन के बावजूद सीट बंटवारे को लेकर मतभेद उभरे हैं, जिससे आगामी चुनावों से पहले असहज स्थिति बन रही है। कुल मिलाकर कई राज्यों में लगातार गुटबाजी, नेतृत्व संकट और सहयोगियों के साथ तालमेल की कमी ने कांग्रेस की स्थिति को कमजोर किया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या चुनौतियों के लिए शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है। सिराज/ईएमएस 24 फरवरी 2026