राष्ट्रीय
28-Feb-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया में करीब 1 करोड़ 98 लाख लोगों की मौत हृदय रोगों के कारण हुई, जिनमें से लगभग 85 प्रतिशत मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसे गंभीर कारणों से हुईं। यह आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि हृदय रोग अब केवल उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि तेजी से वैश्विक महामारी का रूप ले रहे हैं। ताज़ा रिपोर्ट ‘बीट बाय बीट 2025’ इस स्थिति को और गंभीरता से उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में होने वाली कुल हार्ट अटैक से जुड़ी मौतों में से 20 प्रतिशत मौतें अकेले भारत में दर्ज की जाती हैं। यह संख्या न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह बताती है कि देश में दिल की बीमारियों के प्रति जागरूकता, समय पर जांच और चिकित्सकीय मदद की कमी कितनी गहरी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पूर्वी भारत में दिल से जुड़ी बीमारियों की स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। भारत में हृदय रोगों से होने वाली कुल मौतों में लगभग 30 प्रतिशत मामले पूर्वी राज्यों से आते हैं। इस क्षेत्र के हर 10 में से 1 वयस्क को किसी न किसी प्रकार की दिल की बीमारी है। पश्चिम बंगाल में तो कोरोनरी हार्ट डिज़ीज के मरीजों की संख्या राष्ट्रीय औसत से भी कहीं अधिक पाई गई है। यहां अधिक मृत्यु दर के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए गए हैं बीमारी का देर से पता चलना, स्क्रीनिंग की कमी और गोल्डन आवर के भीतर चिकित्सा सहायता न मिल पाना। रिपोर्ट में भारत के साथ दक्षिण और दक्षिण–पूर्व एशिया की स्थिति का भी विस्तृत अध्ययन किया गया है। दक्षिण एशिया में इस्केमिक हार्ट डिज़ीज के मामले पूर्वी एशिया की तुलना में 80 प्रतिशत और दक्षिण–पूर्व एशिया से 30 प्रतिशत अधिक हैं। इस क्षेत्र में हृदय रोग से होने वाली कुल मौतों में 42 प्रतिशत हिस्सा स्ट्रोक का है, जो वैश्विक औसत से काफी ऊपर है। हाइपरटेंशन को हैमरेजिक स्ट्रोक का मुख्य कारण बताया गया है। महामारी के दौरान पूरे एशिया में दिल की बीमारियों से मौतों में तेज़ उछाल दर्ज किया गया। चिंता की बात यह है कि अब दिल की बीमारियां केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि तेजी से युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही हैं। 25 से 45 वर्ष के लोगों में इसके मामले रिकॉर्ड स्तर तक बढ़े हैं। आधुनिक लाइफस्टाइल के कारण युवा लगातार तनाव, डिजिटल बर्नआउट, नींद की कमी और सामाजिक अलगाव का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार 72 प्रतिशत शहरी नौकरीपेशा लोग लगातार स्क्रीन इस्तेमाल करने के कारण डिजिटल थकान का शिकार हो रहे हैं, जबकि सामाजिक रूप से अलग रहने वाले लोगों में कोरोनरी हार्ट डिज़ीज की आशंका 15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। नींद की कमी और अनियमित दिनचर्या भी इस खतरे को कई गुना बढ़ा रही है। बता दें कि दुनिया भर में दिल से जुड़ी बीमारियां लगातार सबसे ज्यादा जान लेने वाली स्वास्थ्य समस्या बन चुकी हैं। बदलती जीवनशैली, तनाव, अनियमित खान–पान और सेहत के प्रति लापरवाही ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। सुदामा/ईएमएस 28 फरवरी 2026