इंदौर, (ईएमएस)। म.प्र. उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायाधीश जेके पिल्लई की एकलपीठ ने रेजीडेंसी एरिया इंदौर की सी.आर.पी. लाइन की ज़मीन पर मस्जिद-मुसाफिरखाना के स्वामित्व विवाद को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी आदेश में कहा है कि चूंकि यह मामला जमीन के स्वामित्व से जुड़ा है, लिहाजा इसका निराकरण रिट याचिका से नहीं किया जा सकता है। तहसीलदार ने 10 फरवरी 2026 को आदेश जारी कर इस जमीन को नज़ूल (सरकारी) भूमि बताकर याचिकाकर्ता कमेटी को अनधिकृत कब्जाधारी घोषित करके तीन दिन में अतिक्रमण हटाने का निर्देश दे दिया था। इस आदेश को उक्त याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। देने वाली याचिका पर जस्टिस जेके पिल्लई की सिंगल बेंच ने कहा है कि यह मामला जमीन के स्वामित्व से जुड़ा है, जिसका निराकरण रिट याचिका से नहीं किया जा सकता है। मस्जिद सदर अंजुमन इस्ला उल मुस्लिमीन इंदौर के एग्जीक्यूटिव अफसर साबिर हासमी की ओर से दाखिल इस याचिका में कहा गया था कि वो एक पंजीकृत वक्फ कमेटी है, जो वक्फ, 1995 के तहत गठित है। कमेटी का कहना था कि सर्वे नंबर 12, रकबा 30,400 वर्गफुट भूमि वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है। 1981 में अर्बन लैंड सीलिंग प्राधिकरण से एनओसी मिला। 1994 में प्रशासन ने मस्जिद और मुसाफिरखाना निर्माण पर आपत्ति नहीं जताई। 1997 और 2003 में नगर निगम से बिल्डिंग परमिशन मिली। इसके लिए सेंट्रल वक्फ काउंसिल ने 80 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया। कमेटी का तर्क था कि तहसीलदार को वक्फ संपत्ति पर आदेश देने का अधिकार नहीं, यह मामला वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आता है।मामले में राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता सुदीप भार्गव ने पक्ष रखते हुए दलील दी कि संबंधित भूमि ब्लॉक नंबर 6, 11 और 12 मिलाकर 40,000 वर्गफुट है। राजस्व रिकॉर्ड में यह स्पष्ट रूप से सरकारी नज़ूल भूमि दर्ज है। केवल लंबे समय से कब्जा या एनओसी होने से भूमिस्वामी अधिकार स्वतः नहीं मिल जाते। यह भी न्यायालय को अवगत कराया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा जमीन का कोई मूल स्वामित्व दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। मामले में सुनवाई के बाद न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था । उक्त फैसला सुनाते हुए एकलपीठ ने कहा कि यह मामला टाइटल, स्वामित्व और सीमांकन जैसे जटिल तथ्यों से जुड़ा है। रिट याचिका (आर्टिकल 226) के तहत न्यायालय तथ्य जांच का मंच नहीं है। तहसीलदार का आदेश भूमिस्वामी अधिकार एमपीएलआरसी के तहत अपील योग्य है। ऐसे में याचिकाकर्ता कानून में मौजूद वैकल्पिक वैधानिक उपाय यथा अपील/ट्रिब्यूनल/सिविल कोर्ट में अपना मामला दाखिल कर सकता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि रिट के माध्यम से स्वामित्व की घोषणा नहीं कराई जा सकती। इस मत के साथ न्यायालय ने मस्जिद सदर अंजुमन इस्ला उल मुस्लिमीन के एग्जीक्यूटिव अफसर साबिर हासमी की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी।