लेख
03-Mar-2026
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(होली पर विशेष) होली पर अगर आप अपने घर से दूर हैं और अपनों के साथ होली के रंग खेलना चाहते हैं तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक युक्त पिचकारी के जरिए आप अपने परिजनों पर मनचाहा रंग डालकर अपनी होली की खुशियों बांट सकते हैं।होली पर यह संभव कर दिखाया है इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट गोरखपुर के छात्रों आदित्य मद्धेशिया और मेराज ने।जिन्होंने सीमा पर तैनात जवानों और अपनों से दूर रहने वाले परिजनों व दूर रह रहे मित्रो के लिए एक एआई लाइव पिचकारी तैयार की है।छात्र मेराज और आदित्य मद्धेशिया ने बताया कि उनके द्वारा तैयार सेटेलाइट एआई पिचकारी न केवल जवानों के लिए, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए है, जो अपने परिवार से दूर हैं और होली जैसे महत्वपूर्ण त्योहार को अपनों के साथ सेलिब्रेट नहीं कर पाते हैं, ऐसे में वे एआई पिचकारी से दुनिया के किसी भी कोने में रंग गुलाल डालकर होली का लुत्फ उठा सकेंगे। छात्र मेराज ने बताया कि यह एआई पिचकारी पूरी तरह से वायरलेस है और वीडियो कॉलिंग के माध्यम से कार्य करती है। इसके द्वारा बाहर रहने वाले व्यक्ति के परिवार के सदस्य वॉयस कमांड का इस्तेमाल करके अपनी पसंद का रंग चुन सकते हैं और जैसे ही बटन दबाया जाता है, वह रंग घर में दिखाई देने लगता है और उसी समय जिस व्यक्ति के पास डिवाइस है, उसमें रंग सक्रिय हो जाता है। यह डिवाइस परिवार के सदस्यों को एक साथ जोड़ने का काम करती है। इस डिवाइस में एक वाटरप्रूफ कैमरा भी शामिल किया गया है, जो लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग की सुविधा प्रदान करता है, जिससे जवान हो या आम नागरिक उनके परिवार के सदस्य एक-दूसरे से वीडियो कॉल के जरिए जुड़ सकते हैं और होली का आनंद ले सकते हैं।छात्र आदित्य ने बताया कि इस अनूठी डिवाइस को बनाने में लगभग दो सप्ताह का समय लगा है और पंद्रह हजार रुपए का खर्च आया है। इसे बनाने में डीसी पंप, 12 वोल्ट, मोबाइल फोन, ड्यूल लेंस कैमरा, प्लास्टिक कैंटेनर इत्यादि का इस्तेमाल कर तैयार किया है।वास्तव में सारा संसार आज दुःखो की होली खेल रहा है। सभी एक दूसरे पर पांचों विकारों व उनके वंशों के बदरंगों की बौछार कर रहे हैं ।किसी पर काम का रंग चढ़ा है तो किसी पर क्रोध का रंग, कोई लोभ में मदहोश है तो कोई मोह के रंग से रंगा हुआ है।स्वार्थ, इर्ष्या, द्वेष, घृणा, अमानवीयता, आपराधिक आकर्षण और बेवजह की आवश्यकता के सूक्ष्म बदरंगो से तो कोई बचा ही नहीं है । इन सबके मूल में है देह अभिमान का रंग, जिसके कारण आज हम सबकी आत्मा भी बदरंग हो गयी है ।जबकि आत्मा का वास्तविक गुण रूपी रंग ज्ञान, शान्ति, प्रेम, सुख, पवित्रता, शक्ति व आनंद का है ,जो कही छिप सा गया है और उसके ऊपर विकारों का कीचड़ आ जाने से सब उल्टा पुल्टा हो गया है । हम सभी को विकारों के रंग के बजाए आत्मिक रंगों से रंगकर सारे विश्व को आत्ममय बनाना चाहिए । यह आत्मिक रंग एक परमात्मा के सत्संग द्वारा प्राप्त होता है । शिव परमात्मा ही नयी दुनिया के स्थापनार्थ कल्प कल्प संगमयुग में अवतरित होकर अपने आत्मा रूपी बच्चों को अपने संग के रंग से रंगकर आप समान पवित्र बना देते हैं ।इसे ही सच्ची होली मनाना भी कहते है । होली मनाने के लिए पहले अपवित्रता व बुराईयो को भस्म करना होगा ।विकार भाव भूलकर पतित से पावन बनकर हमे आपस मे भाई भाई की वृत्ति रखनी होगी तभी हम अविनाशी रंग का अनुभव कर सकेंगे ।परमपिता परमात्मा शिव ने हमें होली शब्द के तीन अर्थ बताये हैं पहला होली अर्थात्‌बीती सो बीती, जो हो गया उसकी चिन्ता न करो तथा आगे के लिए जो भी कर्म करो, योगयुक्त होकर करो। दूसरा होली अर्थात्‌हो गई यानि मैं आत्मा अब ईश्वर अर्पण हो गई, अब जो भी कर्म करना है, वह ईश्वर की मत पर ही करना है। तीसरा होली अर्थात्‌पवित्रता। हमें जो भी कर्म करने हैं, वे किसी भी विकार के वश होकर नहीं वरन्‌पवित्र बुद्धि से करने हैं।(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व आध्यात्मिक चिंतक है) हुड़दंगी नही है होली फाल्गुन मास में नई कोपलें चादर आम के बोर की ओढ़ती पतझड़ बासंती हो जाती है तब मुस्कान लिए होली आती है हवाओ में मादकता फैली है शीत विदा हो उष्णता आ ली है सरसो के फूल खेतो में खिले मुस्कान लिए होली पर मिले बसंत पंचमी से पूर्णिमा तक होलिका प्रतिदिन बढ़ती जाती बड़कुललो से श्रंगार रचाती मुस्कान लिए होली आ जाती भ्रात प्रेम के वशीभूत होलिका भक्त प्रह्लाद की दुश्मन बनी है मारने चली थी जो प्रह्लाद को अन्यायी होलिका खुद मरी है होलिका जलाकर उत्सव मनाते फिर होलिका को ठंडी कराते विकारों पर विजय लाती है होली बुराई सारी जला देती है होली तब मुस्कान लिए आती है होली होली हुड़दंग नही पवित्र पर्व है ईर्ष्या द्वेष छोड़ प्रेम का पर्व है होली गैरो को भी अपना बनाती मुस्कान लेकर आती है होली। ईएमएस / 03 मार्च 26