लेख
07-Mar-2026
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(8 मार्च अंतराष्ट्रीय महिला दिवस) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न भी रखता है।क्या वास्तव में महिलाओं को वह सम्मान, सुरक्षा और समानता मिल रही है जिसकी वे हकदार हैं? हर वर्ष 8 मार्च को दुनिया भर में महिला दिवस मनाया जाता है, महिलाओं की उपलब्धियों का सम्मान किया जाता है, उनकी शक्ति और योगदान की सराहना की जाती है। लेकिन जब हम समाज की वास्तविकता पर नजर डालते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि अभी भी महिलाओं को अनेक प्रकार की चुनौतियों और अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा है। यह दिन हमें केवल बधाई देने का नहीं बल्कि आत्ममंथन करने का अवसर देता है कि आखिर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए हम और हमारा समाज कितना सचेत है। सदियों से समाज में नारी की स्थिति विरोधाभासी रही है। एक ओर उसे देवी का दर्जा दिया गया, उसे शक्ति और सृजन की प्रतीक कहा गया, वहीं दूसरी ओर व्यवहारिक जीवन में उसे अनेक बंधनों में जकड़ दिया गया। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ महिलाओं ने अपने त्याग, साहस और परिश्रम से समाज को दिशा दी है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें बराबरी का स्थान पाने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ा है। आधुनिक युग में शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति में निश्चित रूप से सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार अभी भी अधूरा है क्योंकि सामाजिक मानसिकता और सुरक्षा का वातावरण अभी भी पूरी तरह अनुकूल नहीं बन पाया है। वर्तमान समय में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। बलात्कार, घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, मानव तस्करी, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और साइबर अपराध जैसे कई रूपों में महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं। हर दिन अखबारों और समाचार चैनलों में ऐसी खबरें दिखाई देती हैं जो समाज को झकझोर देने के लिए काफी होती हैं। यह स्थिति केवल किसी एक देश या समाज की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की चिंता का विषय है। तकनीकी विकास और आधुनिकता के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा आज भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। सबसे दुखद बात यह है कि इन घटनाओं के बाद समाज का एक बड़ा वर्ग केवल दर्शक बनकर रह जाता है। कुछ दिनों तक चर्चा होती है, विरोध प्रदर्शन होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है और फिर कोई नई घटना सामने आ जाती है। यह स्थिति बताती है कि समाज में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता अभी भी उतनी मजबूत नहीं हो पाई है जितनी होनी चाहिए। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार केवल कानून और प्रशासन की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक मानसिकता से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है। सरकारें अक्सर महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक योजनाओं और कानूनों की घोषणा करती हैं। कागजों पर कानून सख्त दिखाई देते हैं और सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब वास्तविकता की बात आती है तो अक्सर इन दावों की पोल खुल जाती है। कई मामलों में पीड़ित महिलाओं को न्याय पाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है। पुलिस व्यवस्था की धीमी गति, न्यायिक प्रक्रिया में देरी और प्रशासनिक उदासीनता के कारण कई बार अपराधियों का मनोबल बढ़ जाता है। यही कारण है कि समाज में यह भावना पैदा होती है कि सरकारें केवल घोषणाएँ करने तक सीमित रह जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ठोस बदलाव नहीं दिखाई देता। महिलाओं की सुरक्षा सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि किसी भी समाज की प्रगति का आकलन उसकी महिलाओं की स्थिति से किया जाता है। यदि महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं तो विकास की सारी बातें खोखली लगने लगती हैं। आज भी अनेक ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा एक सपना बनकर रह जाती है। बाल विवाह, शिक्षा से वंचित रहना और आर्थिक निर्भरता जैसी समस्याएँ आज भी मौजूद हैं। जब तक महिलाओं को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सुरक्षित वातावरण नहीं मिलेगा तब तक वास्तविक समानता की कल्पना करना मुश्किल है। यह भी सच है कि महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज की मानसिकता में बदलाव आवश्यक है। बचपन से ही लड़कों और लड़कियों को समानता और सम्मान की भावना सिखाई जानी चाहिए। परिवार, विद्यालय और समाज को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ महिलाओं को केवल सहानुभूति नहीं बल्कि समान अवसर और सम्मान मिले। जब तक समाज में यह सोच बनी रहेगी कि महिला पुरुष से कमजोर है या उसे सीमित भूमिकाओं में ही रहना चाहिए, तब तक अत्याचारों को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं होगा। महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता और प्रतिभा का परिचय दिया है। विज्ञान, राजनीति, शिक्षा, खेल, साहित्य और व्यापार जैसे अनेक क्षेत्रों में महिलाओं ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। वे न केवल अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाती हैं बल्कि समाज और देश के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसके बावजूद यदि उन्हें सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलता तो यह पूरे समाज के लिए शर्म की बात है। आज आवश्यकता इस बात की है कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए समाज और सरकार दोनों को अपनी जिम्मेदारी गंभीरता से निभानी होगी। कानूनों को केवल कागजों तक सीमित रखने के बजाय उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा। अपराधियों को शीघ्र और कठोर दंड मिलना चाहिए ताकि समाज में यह संदेश जाए कि महिलाओं के खिलाफ अपराध किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे। साथ ही महिलाओं को आत्मरक्षा, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के माध्यम से मजबूत बनाना भी जरूरी है। महिला दिवस हमें यह याद दिलाता है कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान केवल एक दिन की चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है। समाज को मूकदर्शक बनने के बजाय सजग प्रहरी बनना होगा और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठानी होगी। जब तक हम सब मिलकर इस दिशा में प्रयास नहीं करेंगे तब तक वास्तविक समानता और न्याय की स्थापना संभव नहीं हो पाएगी। अंततः यह कहना उचित होगा कि नारी केवल परिवार की धुरी नहीं बल्कि पूरे समाज की शक्ति है। उसके बिना जीवन और समाज दोनों अधूरे हैं। इसलिए महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना, उन्हें सुरक्षित वातावरण देना और उनके सम्मान को बनाए रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि समाज वास्तव में प्रगति करना चाहता है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि हर महिला बिना भय के, सम्मान और स्वतंत्रता के साथ अपना जीवन जी सके। यही महिला दिवस का वास्तविक संदेश है और यही एक सभ्य समाज की पहचान भी है। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 7 मार्च /2026