महिला दिवस पर) सदियों से समाज में नारी की भूमिका को परंपराओं, संस्कृतियों और गहरे जमे विश्वासों ने इस प्रकार गढ़ा कि उसे हमेशा पृष्ठभूमि में रखा गया। प्राचीन काल में नारी को देवी के रूप में पूजा जाता था, वह ज्ञान और शक्ति की प्रतीक थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, पितृसत्तात्मक संरचनाओं ने अधिकार ग्रहण कर लिए, जिससे नारी की स्वतंत्रता सीमित हो गई, उसकी आवाज़ दबा दी गई और उसका योगदान अनदेखा कर दिया गया।और तब एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ — न विरोध के कोलाहल से, न ही क्रांति के संघर्ष से, बल्कि एक दूरस्थ, अदृश्य लोक से, पार ब्रह्मतत्व से। वह निःशब्द, फिर भी शक्तिशाली रूप से अवतरित हुआ, जिसने हृदय और मस्तिष्क को आलोकित कर दिया, यह संकेत देते हुए कि परिवर्तन के एक नए युग का आरंभ होने वाला है।हर वर्ष, 8 मार्च को, संपूर्ण विश्व अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाता है—नारी की सहनशक्ति, उपलब्धियों और अधिकारों का सम्मान करते हुए। लेकिन आधुनिक दुनिया में महिलाओं के सशक्तिकरण की चर्चा ज़ोर पकड़ने से बहुत पहले ही, एक आध्यात्मिक आंदोलन—जिसे आज ब्रह्माकुमारीज़ के नाम से जाना जाता है—आत्मिक शक्ति, नेतृत्व और भीतर की जागृति के माध्यम से यह बदलाव शांत रूप से ला रहा है। ईश्वरीय संकेतों और दृष्टि से प्रेरित होकर, प्रजापिता ब्रह्मा बाबा ने यह अनुभव किया कि सच्चा आध्यात्मिक नेतृत्व किसी एक लिंग तक सीमित नहीं हो सकता। दिव्य योजना में अटूट विश्वास रखते हुए, उन्होंने नारी शक्ति को ब्रह्माकुमारीज़ के भविष्य की जिम्मेदारी सौंपी, उन्हें ज्ञान, बुद्धि और निःस्वार्थ सेवा की मशाल थामने का अधिकार दिया। यह एक क्रांतिकारी कदम था। उस समय जब महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बोलने की भी अनुमति नहीं थी, ब्रह्मा बाबा ने कहा कि मातृशक्ति ही मानवता की आध्यात्मिक मार्गदर्शक बनेगी। और इन्हीं असाधारण नारियों में कुछ ऐसी भी थीं, जिन्होंने दिव्यता, शक्ति और बुद्धि की नई परिभाषा गढ़ते हुए सच्चे मार्गदर्शक सितारों के रूप में अपनी पहचान बनाई।इसलिए हम कह सकते है कि भले ही नारी को कभी दोयम दर्जे का माना जाता रहा हो,लेकिन आज नारी तमाम विसंगतियों को धकियाकर अपने कैरियर के पंख फैलाकर आकाश को छू लेने की कोशिश में है।हालांकि जो मां जन्म देती है ,वही पुत्र के लालच में कोख में पल रही कन्या को भ्रूण रूप में ही हत्या तक कराती रही है।इसी कारण हरियाणा जैसे राज्यो में लिंग असमानता हावी रही है।लेकिन कानून की सख्ती व समाज मे आई जागरूकता से परिस्थिति बदली है।अपनी विभिन्न उपेक्षाओं के बावजूद नारी ने जीना सीखा है और सफलता की मंजिल पर आगे बढ़ी है।तभी तो फुलबासन बाई जो कभी दो वक़्त की रोटी को मोहताज थी, आज वह दो लाख महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें रोजगार देने की सफलता की इबादत लिख चुकी है। श्रीमती फूलबासन के नेतृत्व में दो लाख से भी अधिक महिलाओं के इस स्वरोजगार समूह ने शराब में डूबे पुरुषों को सुधारने के लिए भी आंदोलनात्मक अभियान चलाया हुआ है।वे सत्संग के माध्यम से महिलाओं को जोड़ने और उनके जीवन को सही दिशा देने में पिछले बीस साल से जुटी है। उनकी इस उपलब्धि के लिए गत वर्ष सोनी टीवी के धारावाहिक ‘कौन बनेगा करोड़पति में कर्मवीर के सम्मान से नवांजी गई छत्तीसगढ़ की पद्मश्री फूलबासन बाई यादव ने हॉट सीट पर बैठकर फ़िल्म अभिनेत्री रेणुका शहाणे की मदद से पचास लाख रुपये जीते थे। फुलबासन अपनी संस्था ‘मां बम्लेश्वरी जनहित समिति’ के जरिए समाज सेवा करती हैं। 52 वर्ष की फूलबासन यादव छत्तीसगढ़ की आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी महिलाओं के विकास के लिए काम कर रही हैं।स्वयं आत्मनिर्भर बनने व दुसरो को बनाने के लिए फूलबासन का गरीबी से संघर्ष और दूसरों को सशक्त बनाने का योगदान काफी प्रेरणादायक है। इसी तरह 88 वर्षीया निशानेबाज दादी प्रकाशी ने कभी अंग्रेजी की पढ़ाई नही की, लेकिन फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती रही।न बचपन मे न कभी जवानी में ,उसने कभी बन्दूक को हाथ नही लगाया और न ही कभी तीर कमान चलाई लेकिन उसका निशाना ऐसा है जो हमेशा सटीक बैठता है। तभी तो प्रकाशी को दुनिया भर के लोग शूटर दादी या फिर रिवॉल्वर दादी के नाम से जानते और पहचानते है। पिछले साल ह्रदयघात को मात देकर स्वस्थ हुई प्रकाशी दादी ने कहा कि बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओ ही नहीं बेटी खिलाओ भी जरूरी है।यानि बेटियो को खेल के क्षेत्र में भी दो दो हाथ आजमाने चाहिए।उन्होंने चार के बजाए छ अक्षरों का बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ ,बेटी खिलाओ का नारा उदघोषित किया।उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के गांव जोहड़ी गांव की रहने वाली दादी प्रकाशी निशानेबाजी में अनेक प्रतियोगिता जीत चुकी हैं तथा निशानेबाजी के लिए देश विदेश की यात्राएं कर चुकी है।इतना ही नहीं, जिस उम्र में बुजुर्ग महिलाएं परमात्मा की याद के लिए पूजा,पाठ भजन आदि हेतु मंदिरों का रुख करती हैं। उस उम्र में प्रकाशी तोमर ने शूटिंग रेंज जाना शुरु किया था। शूटिंग में ख्याति प्राप्त कर चुकी प्रकाशी तोमर देश विदेश में शूटर दादी या फिर रिवॉल्वर दादी के नाम से मशहूर हो चुकी है। निशानेबाजी में प्रकाशी देवी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कई मेडल और ट्रॉफी झटक चुकी हैं। प्रकाशी देवी को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा नारी शक्ति अवॉर्ड भी दिया जा चुका है। इसके साथ ही महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा आइकन लेडी अवार्ड से सम्मानित किया गया है।वही दुनिया मे सर्वाधिक स्थिर मन की मल्लिका रही ब्रह्माकुमारी दादी जानकी की ईश्वरीय साधना इस कदर थी कि उनके और परमात्मा के बीच मे कभी कोई तीसरा नही रहा। वे हमेशा परमात्मा की याद में लीन रहती और परमात्मा से राजयोग लगाकर बतियाती रहती थी। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका रही दादी जानकी ने 104 वर्ष की आयु तक अपना लौकिक जीवन जिया। दादी जानकी ने कभी अपने पास कोई पर्स नहीं रखा,परन्तु वे आध्यात्मिक दृष्टि से विश्व की सबसे धनी नारी शक्ति रही । शिव बाबा ने खुशी, विश्वास और दुआओं से उनका दामन हमेशा भरकर रखा। वे कहती थी, दुआयें हमारे जीवन का श्रंगार हैं। उन्होंने जीवनभर तीन बातों- सच्चाई, सफाई और सादगी का पालन किया। यही तीन बातें उनके जीवन का आधार, उनकी पूंजी और उनकी शक्ति रही। उन्हें पल- पल महसूस होता था कि शिव बाबा का साथ है और उनसे बाते कर रहा है।दादी जानकी अपने जीवन का अनुभव सुनाया करती थी कि परमात्मा पल पल उनके साथ रहता है और उन्हें सदा परमात्मा की मदद का अनुभव होता है। क्योंकि उन्हें मन- वचन- संकल्प और कर्म में एक परमात्मा के सिवाए और कुछ याद ही नहीं रहता । वे कहा करती थी कि सभी खुश रहें, मस्त रहें और सदा परमात्मा के साथ जीवन में आगे बढ़ते रहे। उनका कहना था कि ईश्वर की मदद, ईश्वर का साथ और ईश्वर को अपना बना लेना ही जीवन सफल करना है। जितना हो ,उतना साइलेंस का अभ्यास बढ़ाओ, क्योंकि साइलेंस की पावर सबसे बड़ी पॉवर है। इसी तरह सी. वनमती केरल के एक गरीब परिवार में पैदा हुई । किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन यह लड़की भारतीय प्रशासनिक सेवा यानि आईएएस अधिकारी बनेगी। वनमती के पिता किराये की कार पर ड्राईवरी करके किसी तरह से घर चलाते थे।इतनी कम आमदनी में आईएसएस बनने की सोचना और उसके लिए संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओ में सफ़ल होना असंभव सा लगता था, लेकिन वनमती के कड़े परिश्रम ने उसे इस मंजिल तक पहुंचाया।भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी वनमती को प्रेरित करने वाली छात्र जीवन मे दो बाते रही । पहली यह कि उनके गृहनगर में जिला मजिस्ट्रेट एक महिला थीं, जिन्हें सभी सम्मान देते थे और दूसरी गंगा यमुना सरस्वती नामक एक सीरियल में, नायक एक महिला आईएएस अधिकारी का किरदार उन्हें बहुत भाया था। वनमती इन्ही दो बातों से प्रेरित हुईं और फिर अपनी मंजिल तय करने के लिए आगे बढ़ गईं।इसके लिए वनमती को स्कूल जाने के साथ-साथ घर के कामों में भी हाथ बंटाना पड़ता था। वे आजीविका का साधन बनी अपनी भैंसों को चराने के लिए चरागाहों में जाती थी,उनके लिए खिलाने हेतु चारा जंगल से काटकर घर भी लाना पड़ता था। वनमती ने जब 12वीं पास की तो रिश्तेदारों ने शादी के लिए परिवार पर दबाव डालना शुरू कर दिया, लेकिन आईएएस बनने का सपना लिए वनमती बगावत पर उतर आई और शादी करने से साफ इनकार कर दिया। अच्छी बात यह रही कि इस दौरान परिवार का समर्थन भी वनमती के साथ बना रहा।वनमती का परिवार हालांकि आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं था, लेकिन परिवार हमेशा उसके साथ सहयोगी बनकर रहा और उन्हें कॉपी किताबें जैसे पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराता रहा। वनमती को अपने परिवार से अच्छा समर्थन मिलने और उनके माता-पिता के वनमती के हित को सर्वपरि रखकर लिए गए फैसले से वनमती की राह आसान हो गई थी। परिवार ने वनमति को आगे की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया और 12 वीं कक्षा पूरी करने के बाद लड़की की शादी करने की परंपरा को बंद करने में अग्रणी भूमिका निभाई।स्नातक करने के बाद वनमती ने कंप्यूटर एप्लीकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन का कोर्स पूरा किया। उन्होंने जेब खर्चे के लिए एक निजी बैंक में नौकरी भी की। इसके बाद वनमती सन 2015 में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शामिल हुई। इस परीक्षा में उनकी सारी मेहनत, पसीना और आंसू उस समय सब कारगर हो गए,जब इस परीक्षा में वनमती सफल हुई। (लेखक ख्यातिलब्ध आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ साहित्यकार है) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 7 मार्च /2026