लेख
07-Mar-2026
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मध्य पूर्व में तेजी से बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान को एक जटिल और संवेदनशील असंमजस की स्थिति में ला खड़ा किया है। अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत हजारों लोगों की मौत के बाद ईरान ने इज़राइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए हैं। इन हमलों की गूंज केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि पाकिस्तान तक भी गहराई से महसूस की जा रही है। ईरान और सऊदी अरब दोनों के साथ करीबी संबंध रखने वाला पाकिस्तान अब ऐसी कूटनीतिक स्थिति में है, जहां तटस्थता बनाए रखना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। पाकिस्तान की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति इस संकट को और जटिल बना देती है। देश की दक्षिण-पश्चिम सीमा लगभग 900 किलोमीटर तक ईरान से लगती है। वहीं सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों में लाखों पाकिस्तानी नागरिक काम करते हैं, जिनकी भेजी हुई रकम पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 2025 में एक रणनीतिक रक्षा समझौता भी हुआ था, जिसके अनुसार किसी एक देश पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। यही समझौता अब पाकिस्तान की तटस्थ नीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। हाल के दिनों में ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। पाकिस्तान ने शुरू में संतुलित प्रतिक्रिया देने की कोशिश की। जब अमेरिका और इज़राइल के हमलों में ईरान के शीर्ष नेतृत्व की मौत हुई तो पाकिस्तान ने इसे “अनुचित” बताया। वहीं ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए गए हमलों की भी आलोचना करते हुए उसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया। यह कूटनीतिक संतुलन इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान किसी भी पक्ष के साथ खुलकर खड़ा होने से बचना चाहता है। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने इस संकट के दौरान सक्रिय कूटनीति अपनाई। उन्होंने सऊदी अरब और ईरान दोनों देशों के नेताओं से लगातार बातचीत की और दोनों पक्षों के बीच संवाद कायम रखने की कोशिश की। डार ने ईरानी विदेश मंत्री को यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है, इसलिए इस स्थिति में पाकिस्तान की संवेदनशीलता को समझना जरूरी है। साथ ही उन्होंने सऊदी नेतृत्व से यह आश्वासन भी प्राप्त किया कि सऊदी भूमि का उपयोग ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं किया जाएगा। हालांकि स्थिति लगातार बदल रही है। सऊदी अरब के सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिससे तनाव और बढ़ गया है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख की सऊदी रक्षा मंत्री के साथ बैठक ने भी संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग पर गंभीर चर्चा चल रही है। यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान की तटस्थता की नीति पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह ईरान को पूरी तरह विरोधी नहीं मान सकता। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध हैं और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहयोग भी आवश्यक है। इसके अलावा ईरान के भीतर अस्थिरता या गृहयुद्ध की स्थिति पाकिस्तान के लिए गंभीर सुरक्षा खतरा बन सकती है। यदि ईरान कमजोर होता है या वहां विदेशी प्रभाव बढ़ता है, तो इसका असर सीधे पाकिस्तान की पश्चिमी सीमाओं पर पड़ सकता है। पाकिस्तान के भीतर धार्मिक और सांप्रदायिक संतुलन भी इस संकट से प्रभावित हो सकता है। पाकिस्तान की आबादी का लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा शिया समुदाय से जुड़ा है, जिसका धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध ईरान से माना जाता है। ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान की भागीदारी देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव को भड़का सकती है। अतीत में पाकिस्तान ने ऐसे तनावों का गहरा अनुभव किया है, जब शिया और सुन्नी समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष हुए थे। इसके अलावा पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की स्थिति भी संवेदनशील है, जिसकी सीमा ईरान से लगती है। यह क्षेत्र लंबे समय से अलगाववादी गतिविधियों और अस्थिरता से प्रभावित रहा है। यदि पाकिस्तान और ईरान के संबंध बिगड़ते हैं, तो इस क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के सामने कई संभावित विकल्प हैं। पहला विकल्प यह है कि वह पूरी तरह तटस्थ बने रहने की कोशिश करे और केवल कूटनीतिक भूमिका निभाए। इस स्थिति में पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर सकता है, क्योंकि उसके दोनों पक्षों के साथ संवाद के रास्ते खुले हैं। दूसरा विकल्प यह है कि पाकिस्तान सऊदी अरब को सीमित सैन्य सहायता दे, जैसे वायु रक्षा प्रणाली या तकनीकी सहयोग। यह सहयोग सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना भी सऊदी अरब की सुरक्षा में मदद कर सकता है। हालांकि इस तरह का कदम भी पाकिस्तान को संघर्ष का अप्रत्यक्ष पक्ष बना सकता है। तीसरा और सबसे कठिन विकल्प यह है कि यदि सऊदी अरब औपचारिक रूप से पाकिस्तान से सैन्य मदद मांगता है, तो पाकिस्तान को निर्णय लेना पड़ सकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि उस स्थिति में पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब का साथ देना लगभग अनिवार्य हो जाएगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच दशकों पुराना रणनीतिक और आर्थिक संबंध है। आर्थिक दृष्टि से भी पाकिस्तान के लिए यह संकट बेहद महत्वपूर्ण है। खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों पाकिस्तानी मजदूरों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। यदि खाड़ी क्षेत्र में युद्ध फैलता है या वहां की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, तो पाकिस्तान को गंभीर आर्थिक झटका लग सकता है। साथ ही ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि भी पाकिस्तान की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। कुल मिलाकर पाकिस्तान इस समय एक बेहद नाजुक संबंध वाली डगर से गुजर रहा है। वह ईरान और सऊदी अरब दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रखना चाहता है, जबकि क्षेत्रीय युद्ध में सीधे शामिल होने से बचना चाहता है। फिलहाल कूटनीति ही उसका सबसे मजबूत हथियार है, लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ेगा, यह संतुलन बनाए रखना कठिन होता जाएगा। यदि भविष्य में स्थिति और गंभीर होती है और पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से किसी एक पक्ष का समर्थन करना पड़ता है, तो संभावना यही जताई जा रही है कि उसका झुकाव सऊदी अरब की ओर होगा। लेकिन ऐसा निर्णय पाकिस्तान के लिए केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक चुनौतियों से भी भरा होगा। यही कारण है कि इस समय पाकिस्तान की पूरी कोशिश है कि वह इस संकट में मध्यस्थ की भूमिका निभाए और क्षेत्रीय युद्ध को और फैलने से रोकने में योगदान दे सके। .../ 7 मार्च /2026