समाज को चौंकाते रहना समाजवादियों का शगल रहा है। नीतीश कुमार भी समाजवादी विचारधारा से ही आते हैं। ऐसा भी नहीं है कि नीतीश कुमार ने होली के दूसरे दिन बिहार और देश के लोगों को पहली बार चौंकाया है। वह पहले भी चौंकाते रहे हैं। कभी अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन से हाथ मिलाकर सत्ता सुख भोगने के लिए, तो कभी भाजपा और एनडीए के साथ गठबंधन करके। अपने इसी हुनर के कारण नीतीश करीब साढ़े 19 वर्षों से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं। इसीलिए विरोधी उन्हें कुर्सी कुमार भी कहते रहे हैं। लेकिन, इन सब के बीच यह कहना गलत नहीं होगा कि नीतीश कुमार की स्वीकार्यता पक्ष-विपक्ष दोनों में तीन दशक से बनी हुई है। सही मायनों में नीतीश पिछले दो दशकों से बिहार की सत्ता की धुरी रहे हैं। फिलहाल, बिहार में सबकुछ ठीक चल रहा था। 2025 में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए को उम्मीद से अधिक वोट और सीटें मिली थीं। कुल 243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए को 202 सीटें मिली थीं। नीतीश कुमार 10 वीं बार 20 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लिये थे। बिहार के लिए यह नया उदाहरण है। लेकिन अचानक होली के दूसरे दिन नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया एक्स पर ट्वीट कर पक्ष-विपक्ष समेत बिहार के आम अवाम को चौंका दिया। अपने ट्वीट संदेश में नीतीश ने लिखा कि ‘दो दशक से अधिक समय से आपने मेरे साथ लगातार विश्वास और समर्थन बनाये रखा। इसकी ही ताकत थी कि बिहार आज विकास और सम्मान का नया आयाम प्रस्तुत कर रहा है। संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही इच्छा थी कि बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के दोनों सदनों का भी सदस्य बनूं। इसी क्रम में राज्यसभा सदस्य बनना चाह रहा हूं। बिहार की नई सरकार को मेरा पूरा समर्थन रहेगा।‘ और फिर तीन घंटे के भीतर उन्होंने केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में राज्यसभा के लिए पर्चा दाखिल कर दिया। नीतीश कुमार के इस फैसले से जनता दल (यूनाईटेड) के कार्यकर्ताओं में गुस्से की लहर दौड़ गई। राज्यभर में विरोध-प्रदर्शन होने लगे। कार्यकर्ता इसे भाजपा की चाल में नीतीश को फंसाने, पार्टी के ही कुछ बड़े नेताओं पर भाजपा के लिए काम करने और जनमत का अपमान बताने लगे। उन्होंने पटना स्थित पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ भी की और नीतीश से अपना फैसला वापस लेने की मांग करने लगे। उनका कहना था कि मतदाताओं ने नीतीश के नाम पर वोट किया था। यह फैसला मतदाताओं की अनदेखी है। नाराज जदयू कार्यकर्ताओं ने जदयू दफ्तर में लगे प्रधानमंत्री के पोस्टर पर कालिख पोत दी। नाराजगी सिर्फ कार्यकर्ताओं में ही नहीं है। जदयू के श्याम रजक, विनय चौधरी समेत कई विधायक नीतीश के इस फैसले से इत्तेफाक नहीं रखते। विधायक अनिल चौधरी तो खुलकर कहते हैं कि साढ़े तीन महीने में आखिर ऐसा क्या हो गया कि मुख्यमंत्री को ऐसा निर्णय लेना पड़ा। जदयू एमएलसी नीरज कुमार कहते हैं कि जदयू के कार्यकर्ताओं को दुख है। जिन लोगों ने हमें वोट नहीं दिया वे भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अब सीएम ने बिहार छोड़कर दिल्ली जाने का फैसला किया है। लेकिन पार्टी ने जिनको जिम्मेदारी दी है, उनके सामने यह सवाल है कि अब राजनीतिक विरासत कौन संभालेगा ? नीतीश कुमार को अगर किसी समस्या के बारे में पता चलता था तो वो तुरंत एक्शन लेते थे। अब यह कौन करेगा ? उधर, नीतीश की इस चाल से विपक्ष की बोलती बंद हो गई। उनकी रही-सही उम्मीदों पर ओले गिर गए। विपक्ष के नेता भले ही नीतीश कुमार को कुछ वर्षों से ‘पलटूराम’ कहा करते थे लेकिन उनके मन में हमेशा यह बात रहती थी कि नीतीश कभी न कभी भाजपा के दबाव से ऊबकर उनके साथ आ सकते हैं। लेकिन इस बार नीतीश ने कोई मौका नहीं दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने महागठबंधन को इतनी सीटें नहीं दी जिससे नीतीश उनके साथ कोई जोड़तोड़ कर पाते। महागठबंधन के सबसे बड़े दल राष्ट्रीय जनता दल को महज 25 सीटें मिली हैं। मुश्किल से तेजस्वी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिला है। कांग्रेस और कमजोर हुई है। हां, नीतीश के इस कदम से भाजपा की बाछें खिल गयी है। बिहार में पहली बार उसे सरकार बनाने का मौका मिल रहा है। पिछले 21 वर्षों से भाजपा नीतीश की पिछलग्गू बनी हुई थी। नीतीश महागठबंधन के पाले में जाते थे तो उसे विपक्ष में बैठना पड़ता था। बीच के वर्षों में दो बार ऐसा हो चुका है। अब पहली बार उसे खुलकर खेलने का मौका मिलेगा। इसके अलावा नीतीश के शासनकाल की चुनावी घोषणाओं को पूरा करने की उसकी जवाबदेही भी नहीं रहेगी। साढ़े चार साल तक उसका निष्कंटक राज चलेगा। गठबंधन में शामिल जदयू के नेता समय के साथ या तो भाजपा में चले जाएंगे अथवा खंड-खंड हो जाएंगे। भाजपा का यही इतिहास रहा है। यकीन न हो तो इंडियन नेशनल लोकदल, अकाली दल, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस आदि का इतिहास देख लें। पता चल जाएगा। जानकार दावा तो यह भी करते हैं कि भाजपा अपनी मुहिम में काफी पहले से लगी थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में लोगों ने बखूबी देखा कि किसके इशारे पर चिराग की लोजपा ने भाजपा के टिकट से वंचित नेताओं को अपने बैनर तले जदयू उम्मीदवारों के खिलाफ मैदान में उतार दिया था। नतीजतन, जदयू 43 सीटों पर सिमट गयी थी। 2025 चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे में भाजपा ने जदयू की सीटिंग सीटें भी लोजपा को दे दी थी। जदयू की ओर से सीटों की बातचीत कर रहे पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और मंत्री राजीव रंजन सिंह ऊर्फ ललन सिंह मान भी गए थे। लेकिन समय रहते नीतीश सचेत हो गए और उन्होंने करीब आधा दर्जन सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए थे। वे जीतकर आ भी गए। तब भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह मन मसोस कर रह गए थे। यही नहीं चुनाव के दौरान भी एक टीवी इंटरव्यू में अमित शाह ने साफ कहा था कि मुख्यमंत्री का फैसला विधायक करेंगे। हालांकि नुकसान होता देख भाजपा नेताओं को चुनाव के बीच नीतीश के नाम पर मुहर लगानी पड़ी थी। सवाल उठता है कि अब अचानक ऐसी क्या स्थिति बन गयी कि नीतीश कुमार को बिहार की सत्ता रास नहीं आ रही है। राज्यसभा में तो नीतीश जब चाहते जा सकते थे। रही बात बेटे निशांत को राजनीति में लांच करने की, तो नीतीश को कौन रोक रहा था। जदयू के नेता-कार्यकर्ता तो पहले से इसकी मांग कर रहे थे। नीतीश चाहते तो देश में सर्वाधिक दिन तक मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम कर सकते थे। लेकिन इस उपलब्धि से चूक क्यों गए ? इसका जवाब तो नीतीश ही दे सकते हैं। फिलहाल, देश में सबसे अधिक दिनों 24 वर्ष 166 दिन मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड सिक्किम के पवन कुमार चामलिंग के नाम है। नवीन पटनायक (ओडिशा) 24 वर्ष 94 दिन, ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल) 23 वर्ष 137 दिन, गेगोंग अपांग (अरुणाचल प्रदेश) 22 वर्ष 250 दिन, ललथनहवला (मिजोरम) 22 वर्ष 60 दिन, वीरभद्र सिंह (हिमाचल प्रदेश) 21 वर्ष 13 दिन, और माणिक सरकार (त्रिपुरा) 19 वर्ष 363 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे। नीतीश का नंबर आठवें पायदान पर आता है। ईएमएस / 07 मार्च 26