लेख
09-Mar-2026
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भारतीय स्वतंत्रता के अब तक के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है, जब किसी राज्य के संवैधानिक शीर्ष पदाधिकारियों ने राष्ट्र प्रमुख अर्थात् महामहिम राष्ट्रपति जी के ‘प्रोटोकॉल’ की अनदेखी की हो? यह हुआ है उस राज्य में जहां की मुख्यमंत्री अपने आपको सभी संवैधानिक मर्यादाओं और कानूनों से ऊपर मानती है, यह राज्य पश्चिम बंगाल और उसकी मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी है, जिन्होंने पिछले दिनों महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू की संवैधानिक बैइज्जती की और अपने राज्य में उन्हें वह कानूनी सम्मान नही दिया जो राष्ट्रपति को गरिमा के अनुकूल जरूरी था और तभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी को कहना पड़ा कि ‘‘ममता सरकार ने सारी हदें पार कर दी और राष्ट्रपति को यह कहाकर अपने आपकों संतुष्ट करना पड़ा कि वे बंगाल की बेटी है और वह राज्य उनका ‘घर’ है।’’ पिछले दिनों राष्ट्रपति पश्चिम बंगाल के अधिकारिक सरकारी दौरे पर थी और वहां उन्हें कई कार्यक्रमों में भाग लेना था, लेकिन वही न सिर्फ वक्त पर कार्यक्रम स्थल बदले गए, बल्कि मुख्यमंत्री व उनके मंत्री मंडल के सदस्यों ने भी राष्ट्रपति के कार्यक्रमों की पूरी उपेक्षा की और उनमें शामिल नश्ही हुए, यही नही राष्ट्रपति के कलकत्ता पहुंचने पर मुख्यमंत्री द्वारा उनकी अगवानी भी नही की गई। अब तक के स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है और जब ममता सरकार की इस उपेक्षा से राष्ट्रपति दुःखी हुई, तो ममता ने उनके दुःख को ‘राजनीति’ की संज्ञा दे दी। यह व्यवहार किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर विराजित राजनेता के लिए पूरी तरह अशोभनीय व राजनीति के नाम पर कलंक ही कहा जायेगा और प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ा कि अब तक के भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मूजी पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के दौरे पर थी और वहां की स्थिति का आंकलन कर वे काफी दुःखी भी हुई। पश्चिम बंगाल सरकार ने सिर्फ उनके कार्यक्रमों की उपेक्षा की, बल्कि एनवक्त पर कार्यक्रम स्थल भी बदले गए, जिसके प्रति राष्ट्रपति ने नाराजी भी व्यक्त की। दरअसल राष्ट्रपति जी नौवें अन्तर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में भाग लेने के लिए कोलकाता गई थी, मूल रूप से यह कार्यक्रम सिलीगुड़ी में प्रस्तावित था, लेकिन सुरक्षा कारणों का हवाला देकर प्रशासन ने इसे बागडोगरा एयरपोर्ट के पास गोपालपुर में स्थानांतरित कर दिया, राष्ट्रपति जब कार्यक्रम में भाग लेने पहुंची तो वहां काफी सीमित संख्या में लोग उपस्थित थे, न वहां मुख्यमंत्री थी और न ही उनके मंत्रीमंडल का कोई सदस्य, सिलीगुडी के मेयर ने राष्ट्रपति का कोई स्वागत किया, इससे राष्ट्रपति ने अपने आपको काफी अपमानित महसूस किया और इसी मुड में राष्ट्रपति ने आदिवासियों से जुड़े कार्यक्रम में भाग लिया, जिसमें राष्ट्रपति को यह कहना पड़ा कि- ‘‘पश्चिम बंगाल सरकार नही चाहती कि आदिवासियों का भला हो।’’ वास्तव में ममता जी के इस तरह के कथन से यह स्पष्ट हो रहा था कि वे राष्ट्रपति के भाषण में राजनीति खोज रही है, तभी ममता ने यह भी कहा दिया कि- ‘‘राष्ट्रपति पहले भाजपा शासित राज्यों की हालत देखें, फिर पश्चिम बंगाल पर टिप्पणी करें’’। इस प्रकार कुल मिलाकर महामहिम राष्ट्रपति जी का पश्चिम बंगाल का दौरा राजनीति में खोकर रह गया, अब इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाए? त्रियाचरित्र या आज की राजनीति को? ईएमएस / 09 मार्च 26