क्षेत्रीय
09-Mar-2026
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- लेखा-जोखा की मांग या चुनाव टालने की रणनीति? जबलपुर, (ईएमएस)। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में गैर-शिक्षण कर्मचारी संघ के चुनाव को लेकर फिर से विवाद की स्थिति बन गई है। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मतदाता सूची पर हस्ताक्षर को लेकर उठे विवाद ने पूरे मामले को पेचीदा बना दिया है। मुख्य मुद्दा वार्षिक आय-व्यय के लेखा-जोखा की मांग का है, जिसे लेकर कर्मचारी संघ दो गुटों में बंट गया है। सवाल यह उठ रहा है कि यह मांग पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए है या फिर चुनाव प्रक्रिया को टालने की रणनीति। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति किए जाने के बाद उम्मीद थी कि जल्द ही चुनाव कार्यक्रम की अधिसूचना जारी होगी। नियमानुसार निर्वाचन अधिकारी कुलपति की सहमति से चुनाव प्रक्रिया शुरू करते हैं और संघ की प्रमाणित मतदाता सूची का प्रकाशन किया जाता है। जानकारी के अनुसार संघ के दो उपाध्यक्ष और महासचिव ने मिलकर मतदाता सूची तैयार कर ली है और उसे निर्वाचन अधिकारी को सौंपने की तैयारी थी। अध्यक्ष ने किया हस्ताक्षर से इंकार… लेकिन अध्यक्ष वीरेंद्र पटेल ने सूची पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि हस्ताक्षर से पहले संघ के पूरे वर्ष का आय-व्यय विवरण स्पष्ट किया जाए। उनका तर्क है कि वित्तीय पारदर्शिता के बिना चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा। वे महासचिव से वार्षिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर विरोधी गुट इस मांग को चुनाव टालने की कोशिश बता रहा है। उनका कहना है कि संघ का बैंक खाता स्वयं अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षर से संचालित होता है। ऐसे में यदि किसी तरह की वित्तीय जानकारी की जरूरत थी तो उसे पहले ही स्पष्ट किया जा सकता था। चुनावी प्रक्रिया के बीच लेखा-जोखा को मुद्दा बनाना संदेह पैदा करता है। विरोधी गुट का आरोप है कि यह कदम जानबूझकर चुनाव कार्यक्रम की घोषणा में देरी कराने के लिए उठाया गया है। कार्यकाल खत्म, अधिकार शून्य… स्थिति तब और गंभीर हो गई जब यह तथ्य सामने आया कि कर्मचारी संघ के वर्तमान पदाधिकारियों का कार्यकाल 2 मार्च को समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद नई कार्यकारिणी का गठन नहीं हो सका है। विपक्षी गुट का कहना है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद वर्तमान पदाधिकारी किसी भी आधिकारिक निर्णय या बैठक बुलाने के वैधानिक अधिकार में नहीं हैं। वहीं अध्यक्ष द्वारा 16 मार्च को आमसभा बुलाने के निर्णय का भी विरोध किया जा रहा है। कर्मचारियों के बीच इस खींचतान से असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक ओर पारदर्शिता और नियमों के पालन की बात की जा रही है, तो दूसरी ओर चुनाव प्रक्रिया को समय पर पूरा कराने की मांग उठ रही है। संघ के भीतर यह विवाद अब केवल मतदाता सूची या लेखा-जोखा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आपसी विश्वास के संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कुलगुरु के पाले में गेंद… विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति की भूमिका अब अहम मानी जा रही है। कर्मचारी वर्ग की मांग है कि कुलपति हस्तक्षेप कर स्थिति स्पष्ट करें और जल्द चुनाव की नई तिथियों की घोषणा कराएं, ताकि लंबे समय से चल रहा गतिरोध समाप्त हो सके। फिलहाल पूरे विश्वविद्यालय परिसर में यही चर्चा है कि यह विवाद पारदर्शिता का मुद्दा है या फिर सत्ता संतुलन का संघर्ष। सुनील साहू / शहबाज / 09 मार्च 2026/ 06.18